Parishram
By Ravi Soni
ख्वाबो का वो हिमालय सर करते है न
शिद्दत से एक उड़ान सपनो की भरते है न
नीरस ज़िन्दगी के अंधेरो में ख्वाबो के उजियारे भरे
मार्तण्ड दिनकर रवि की तरह जलते है न
सरकारे तो होती है समाज का प्रतिबिंब
निंदा करने से पहले हम सुधरते है न
बीतते वक़्त मे ये ज़िन्दगी गलत आकार न लेले
परिश्रम के वो सही ढांचे में ढलते है न
बेवजह सुबह को शाम करने मे होगी ज़िन्दगी तमाम
ज़ोर से एक दौड़ मंज़िल की तरफ भरते है न
By Ravi Soni

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