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Nostalgia: Childhood Memories ✨

By Lakshmi Bhatt


(A Poem in Reminiscence)

जैसे छूट गया हो कोई सपना अधूरा,

या धूप में छाया का टुकड़ा — ठंडा, पुराना, मगर अपना सा।

बचपन की वो गलियाँ फिर दिल में उतर आई हैं,

जहाँ हर मोड़ पर कोई कहानी छुपी बैठी थी।

पापा की आवाज़ अब भी गूंजती है मन के कोने में —

"ज्यों निकल कर बादलों की गोद से

थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी..."

हम छत पर लेटे, बिजली गायब — चाँदनी से सजी रातें।

आँखें आसमान में — तारे गिनते,

कभी परियों के देश की सैर करते,

कभी सोचते — एलियन्स क्या सच में हमारे ऊपर से उड़ते होंगे?

मच्छरदानी की जाली से छनती हवा,

और दूर से आती लोरी सी आवाज़ें —

जैसे पूरी दुनिया सुस्ताकर चुप हो गई हो,

बस हमारी कल्पनाओं की रेलगाड़ी चल रही हो।

बारिश का पानी —

बड़े जतन से बनाई कागज़ की नाव उसमें तैराते थे।

हर लहर के साथ लगता जैसे एक सपना बह चला हो —

सपना जिसमें डर नहीं था, सिर्फ़ उड़ान थी।

फिर वो गर्मियों की छुट्टियाँ —

माँ के साथ पैकिंग, और निकल पड़ना —

Tehri Garhwal की वादियों में।

हवा में एक मीठी सी गंध —

पेड़ों से तोड़े खुमानी, सिरोले, सेब,

जैसे धरती खुद हमें उपहार दे रही हो।

हाथों में रस टपकता, चेहरे पर धूप की चमक,

और पैरों के नीचे वो मिट्टी —

जिसमें हमारे नाना-नानी की हँसी गूंजी थी कभी।

अब जब ज़िन्दगी तेज़ चलती है,

तब वो पल धीमे-धीमे वापस आते हैं।

पापा की वो कविता अब समझ में आती है —

"सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,

आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी?"

बचपन एक बूँद ही तो था —


जो बादलों की गोद से निकली थी,

अब धूल में मिली है या किसी दिल की तह में बसी —

ये कौन जाने?


By Lakshmi Bhatt

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