Nihshabd
By Dr. Tara Nigam
स्तब्ध हूँ निःशब्द हूँ, हूँ अपनी गलतियों पर शर्मिंदा
जो ना रहती ख़ामोश मैं, तो होती शायद ज़िंदा
है यही पर्याय कथन का, जो हर नारी समझती है
दूसरों कि फरमाइश में,जो हर रोज़ झुलसती है
खो कर अपने आत्मबल को, क्यूँ ख़ुद को कमज़ोर किया
रहा ना कोई साथ तुम्हारे, क्यूँ तुमने ख़ुद को छोड़ दिया
क्यूँ छोड़ दिए प्रयत्न सारे, क्यूँ रह गयी एकाकी तुम
क़िस्मत भी क्यूँ देगी साथ, जब धरे हाथ हो बैठी तुम
मरे हुए अस्तित्व से बदत्तर शायद कुछ और नहीं
क्याकरोगीअबचितामेंजलकर, जबभुगतचुकीहोनर्कयहीं।
By Dr. Tara Nigam

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