Nazm- Ham Hami Ke Ab Nahi
- Hashtag Kalakar
- Dec 19, 2025
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By Kshitij Kawatra
हम हमीं के अब नहीं शायद दिवाने हो गए
अपनी ही हम फ़िल्म के हीरो पुराने हो गए
रात दिन की नौकरी सोए न सोने दे ये पर
इक हँसी से कितने रोशन आशियाने हो गए
बाँध कर जो वक़्त खूँठे से रखा करते थे हम
संग उन के सहल वो लम्हे बिताने/गँवाने हो गए
है नज़र आती झलक तुझ में मेरे अज्दाद की
इस बहाने उनसे भी मिलने मिलाने हो गए
लड़खड़ाते हैं क़दम रुकना न सीखा हमने पर
खानदानी ढीट गिर गिर कर स्याने हो गए
भूक गर्मी नींद बे-चैनी या किलकारी तिरी
याद मुझ को मुख़्तलिफ़ सारे तराने हो गए
नींद आंखों में लिए जब शाम तकती है मुझे
जिंदगी लोरी-नुमा क़िस्से ख़ज़ाने हो गए
शान से शाने पे तुझ को मैं उठाए चल रहा
मेरी सब से गुफ़्तुगू तेरे फ़साने हो गए
सोचता हूँ क्या विरासत में तुझे मैं दे चला
ज़िंदगी फिर आँकने के ये बहाने हो गए
By Kshitij Kawatra

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