Naye Sapno Ka Agaz
By Pooja Singh
प्रस्तर का सीना भेद देख नवअंकुर फूटा है,
प्राची की अरुणिम आभा में कल का अंधकार छूटा है!!
प्रकृति के हर कण में अदम्य साहस का संगीत है बहता,
पथ पर आगे बढ़ने को प्रतिक्षण है कहता!!
तू किस बात का शोक मना रहा अब तक,
आ! उठ ,चल देख नए दौर में नए सपनों का आगाज हुआ है!!
माना की गजब लड़ाई थी,
हर कदम पर किस्मत से की जोर आजमाइश थी!
पर जो दौर बीत गया अब उसका क्या रोना,
नई पुरवइया में पलकों पर फिर नया है सपना बोना!!
जीवन के हर पड़ाव पर तू क्यों रुकता है,
रे वनवासी! कल के डूब चुके सूरज में आज के स्वर्णिम पल क्यों खोता है!!
सदियों से नदियां उपल से भिड़ती आई है,
पर क्या तूने कभी श्रवण किया किसी विपदा में धारा उनकी रुकती आई है!
हर ताप को झेल वो अविरल बहती रहती हैं,
कर्तव्य पथ पर डटे रहो बस प्रतिपल यह वो हमसे कहती है!!
पतझड़ के बाद ही तो बसंत का बयार बहता है,
फिर तू क्यों अपने सपनों से रार ठाना रहता है,
आ! उठ, चल देख नए दौर में नए सपनों का आगाज हुआ है!!
By Pooja Singh

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