Mirza Ka Maun
By Rajiya
कभी कभी जी भागना चाहता है। उस जहां में, जिस जहां में लैला की मोहब्बत है, मजनू का इंतजार है। रांझे का
रुतबा है, हीर का प्यार है। मिर्जा का मौन है, साहिबान का सब्र है।
फूलों की महक है, शीतल हवा है, तितलियों की चुप्पी है, भौरों का गुंजार है।
जहां भगवान रहते हैं। जहां समाज के व्यर्थ बंधनों से आजादी है।
जिस जहां में ना कुछ पाने की लालसा है, ना ही खोने का डर।
जहां ना मिलने की आतुरता है और ना ही बिछड़ने का दुःख।
जहां ना चांद की चांदनी है और ना ही सूरज की किरण।
ना ही अंधेरे का डर है और ना ही उजाले का इंतजार।
जहां ना ही इज्जत का मोह है और ना ही बेइज्जती का भय।
ना ही अपनों के लिबास में पराए हैं और ना ही उच्च और निम्न के दरमियां फासले हैं।
फिर यकायक याद आता है, ये तो महज कल्पनाएं हैं — हकीकत का तो इनसे कोई ताल्लुक नहीं है। ✍️
By Rajiya

Simple, graceful, and full of feeling.
The poetry leaves a peaceful impression
Beautifully written, with a calm and thoughtful flow.
The words feel pure and deeply touching.
यह कविता किसी जगह का वर्णन नहीं, बल्कि आत्मा की तलाश है। शब्दों में इतनी सादगी है कि वे सीधे दिल तक पहुँचते हैं, और अर्थ इतने गहरे कि हर पंक्ति ठहरकर सोचने को मजबूर कर देती है। मोह, भय, लालसा और बंधनों से परे एक ऐसी दुनिया का चित्रण है जहाँ शांति ही सत्य है। कल्पना और दर्शन का ऐसा सुंदर मेल बहुत कम पढ़ने को मिलता है—लेखन सचमुच उच्च कोटि का है।