Meri Kalpana
By Anurag Nigam
इक पायल थी उसके पाँव में
जिसकी झंकार ने मुझे पागल कर रखा था...
छमछम करती दौड़ आया करती थी
दौड़ कर गले लगाया करती थी
कुछ बोलती और कुछ बोलते बोलते रुक जाया करती थी
उसके इस तकरार ने मुझे पागल कर रखा था...
कुछ चूड़ियाँ इक हाथ में पहने तंग करती
छनकती आवाजों संग अदा से लहराया करती थी
कभी कभी गुस्से में कोई बात समझाया करती
बड़ी आँखें और लाल गाल, कसम से इस तकरार ने मुझे पागल कर रखा था...
कमर में साड़ी बांधे कानों में बड़े बड़े झुमके
आँखों में गहरे काजल की इक लाइन बनाया करती थी
वो बिना किसी श्रंगार के भी कमाल लगती
उसकी तिरछी नजर और गालों पर गिरती बालों की लट ने मुझे पागल कर रखा था...
कभी सारे घर में आवाज लगती वो मुझे
जर्रे जर्रे में ढूंढा करती थी
सोंचती मुझे, याद करती, चुप चुप रोया करती थी
ये हकीकत नहीं मेरी कल्पना है,
बस इसी कल्पना ने मुझे पागल कर रखा था...
इक पायल थी उसके पाँव में
जिसकी झंकार ने……||
By Anurag Nigam

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