Mera Gaon
Updated: Sep 16, 2025
By Farheen Sharif
कुछ इस तरह का था गाँव मेरा
बीता वहाँ था बचपन मेरा,
कोयल की राग जहाँ करती थी सवेरा
वक्त न जाने कैसे था ढलता,
एक पल थी साँझ, दुसरी करती थी अंधेरा
रात संघ लाती थी तारों की सौगात,
चांदनी मे गूंजती थी घुग्घू की आवाज़,
उषा को जगती मुर्गे की बाँघ,
झूम उठता था सारा खेत खलिहान
कुछ इस तरह का था गाँव मेरा
पक्की सड़क से आधी मील पैदल सफर,
पार उस नदिया के जो थी जीवन की लहर,
उबड़ सा पथरीला रास्ता ले चलता जहाँ,
पुरानी हवेली के पीछे का तीसरा मकान
फाटक के आगे का वह विशाल सा बारामदा
जहाँ मेरे गुड्डे गुड़िया का ब्याह था रचा
कुछ इस तरह का था गाँव मेरा
गलियारे पे लगे वह रंगीन फूलदान,
जिन्हे सींचे रखता था बूढ़ा बाग़बान
बारामदे मे बिची वह छोटी सी चारपाई
निंदिया उस पर जैसी, और कहीं न आई
छज्जे पे जो जमाये हैं जलसा कबूतर,
खना खिलाती थी माँ, इन्ही को तो दिखाकर.
कुछ इस तरह का था गाँव मेरा
बसंत जो संघ लाती ऋत सुनहरा,
चाशनी सी बेरियां, और लागे आम का मेला
दौड़ लगाते पकडने वह टिमटिमाते जुगनू,
न रुकते चाहे टूट जाते बिछिया के घुंघरू,
वोह छिले घुटने और फूटी एडियाँ,
कहाँ रोक पाती थी लड़कपन की मटरगश्तियां।
By Farheen Sharif

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