Life Is Like Facebook's Timeline
By Jwala
हमारे कुछ मित्र हैं जो हमें फिलॉसफर समझते हैं। उनमें से ही एक है आकाश। बैंगलोर में नौकरी करता है। छुट्टियों में जब भी आता है हमसे मिलने ज़रूर आता है और जब भी आता है कुछ न कुछ सवाल होते हैं उसके पास। आज बहुत दिनों के बाद मिलने आया।
हम बैठे किताब पढ़ रहे थे। वो आया तो चाय-नाश्ता मंगाया हमने। थोड़ा परेशान लग रहा था तो हम पूछ बैठे की क्या बात है।
“यार मेरे कुछ समझ नही आ रहा है, बहुत परेशान हूं मैं”, उसने निराश स्वर में कहा।
” क्या हुआ ये तो बताओ?”
“कुछ नहीं यार, बस जिंदगी में मज़ा नही आ रहा है?”
मेरी हंसी छूट गयी। मुँह पर हाथ रख मैंने अपनी हंसी रोकी और पूछा, “यार 1 लाख 20 हज़ार महीना की सैलरी है तेरी, और तुझे मज़ा नहीं आ रहा?”
“यार तू तो जानता है न ये नौकरी-वॉकरी में मेरा इंटरेस्ट नहीं है”
” हम्म… अच्छा और स्कूल में तो तू कुछ कुकिंग और शेफ वगैरह कुछ बनना चाहता था न?”, मैंने उसे नाश्ता लेने का इशारा करते हुए पूछा।
“होटल मैनेजमेंट… करना तो होटल मैनेजमेंट था मुझे यार, पर इस नौकरी मैं फंसा हुआ हूँ”
“अबे तो छोड़ दे न… क्या दिक्कत है?”
“छोड़ दूं? पागल है क्या?”
“अरे! पागल मैं नहीं तू है। पसंद नही तो छोड़ दे”
“इतना आसान नहीं है यार। नहीं तो कब का छोड़ दिया होता”, उसने थोड़ा खीजते हुए कहा।
“परेशानी क्या है? घरवाले मना कर रहे हैं क्या?”
“घरवाले भी और उसके साथ-साथ बहुत सी प्रोब्लेम्स हैं यार। मेरा बॉस, मेरे कलीग्स हर कोई बस एक ही बात कह रहा है कि ऐसी नौकरी फिर नही मिलेगी…और होटल मैनेजमेंट इतना आसान नही है। अगर नौकरी छोड़ी तो शायद गलती करूँगा। अब तू ही बता किसकी सुनूं? उनकी या अपने दिल की?”
“यार ये तो तेरे ऊपर है। देख रिस्क तो है …पर इस रिस्क को नहीं लेगा तो और बड़ा रिस्क है।”, मैने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा।
“कुछ समझ नहीं आ रहा है यार…जिंदगी बोहत मुश्किल हो गयी है…भगवान ही मालिक है अब तो”, उसने निराश लहजे में कहा।
“जिंदगी मुश्किल नहीं हुई है, तुम उसे मुश्किल बना रहे हो…तुम्हे तो पता भी नहीं कि जिंदगी है क्या चीज़”, मैने भी आवाज़ ऊँची करते हुए बोला।
“यार तो तुम्ही हमें बताओ कि ये जिंदगी आखिर क्या है?”
अब ये सवाल गहरा था। इसका जवाब हर किसी का उसकी बुद्धि के हिसाब से अलग-अलग होता है। पर हमारे पास जवाब था। असली जवाब। पर हमने नहीं बताया। अब नहीं बताने के दो कारण थे। पहला तो ये की असली जवाब उसके समझ में नहीं आता और दूसरा ये कि उसे एक चीज़ बताओ तो चार अलग से पूछता है । फिर हमने बहुत सोचा तो एक और जवाब मिला।
उसने नाश्ते की प्लेट से बिस्किट उठाते हुए फिर पूछा, “अरे भाई बताओ भी की ये साली जिंदगी है क्या चीज़?”
इस बार हम मुस्कुराये और मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “फेसबुक है”
“फेसबुक?” उसने आश्चर्य से पूछा।
“जी हां, फेसबुक”
उसे लगा हम मजाक कर रहे हैं।
बोला, “अरे मियां मज़ाक छोडो। हम यहाँ सिरियस हो कर पूछ रहे हैं और आप हैं कि मसकड़ी सूझ रही है।”
“अरे! मजाक नहीं सच कह रहा हूँ भाई”
(अब उसके चेहरे के भाव बदल रहे थे)
“अच्छा तो क-क-कैसे? चलो बताओ”, उसने झल्लाते हुए पूछा।
“यार पहले तो तुम थोड़ा शांत हो जाओ और जानना है तो शांत दिमाग से सुनो”
वो थोड़ा शांत हुआ और बोला, “अच्छा ठीक है, बताओ।”
“देखो यार इसके कई जवाब हैं। मैं तुम्हें वो बता देता हूँ जो सबसे सरल और सटीक है। तुम्हे अच्छा लगे तो रख लेना।”
“OK”, उसने हाँ में स्वर मिलाते हुए कहा।
“तो सुनो, पहले क्या था?”, हमने पुछा।
“क्या था? ‘क्या था’ मतलब क्या है? बहुत कुछ था”, उसने बोला।
“नहीं, पहले कुछ नहीं था इसलिए बहुत कुछ था।”
“यार तुम देखो हमसे सीधी-सीधी भाषा में बात करो।”, उसने चाय उठाते हुए कहा।
“ठीक है, तो सुनो। पहले कुछ नहीं था। फिर इंटरनेट आया। उसके बाद ऑरकुट वगैरह आये और फिर…दुनिया में आया फेसबुक।”
वो ध्यान से सुन रहा था। हमने भी गहरी सांस ली और आगे बोलने लगे –
“तो पहले दुनिया में फेसबुक था और अब फेसबुक पर दुनिया है या यूं कहें कि फेसबुक ही दुनिया है।”
उसके चेहरे पर उलझन की लकीरें साफ़ झलक रही थीं। फेसबुक दुनिया कैसे हुआ, वो नहीं समझ पा रहा था। तो हमने बात को आसान बनाते हुए कहा –
“तुम ऐसे समझो कि पहले किसी से झगड़ा होता था तो, क्या होता था?
तुम चार लड़के ले कर जाते थे। वो चार लड़के ले कर आते थे। झगड़ा होता था। फिर एक बिचौलिया आता था और समझौता कर लेते थे।
क्लास में तुम भले ही पहली डैस्क पर बैठो पर आखिरी डैस्क पर बैठने वाले का जन्मदिन भी तुम्हे याद होता था। उसके घर जाते थे, केक खाते थे।
क्लास के दरवाज़े से जब वो अंदर आती थी… तो बस उस दिन स्कूल जाना सार्थक लगने लगता था। दूसरा लड़का उससे बात भी करे तो उसी वक्त वो अघोषित शत्रु हो जाता था।
हर एक दोस्त को पता होता था कि किस लड़की के नाम से किसे चिढाना है। सबकी बंदियां फिक्स होती थीं।
तुम कंपते हाथों से वैलनटाइन्स के दिन उसे लाल गुलाब देकर इज़हार करते थे। वो हाँ करे तो खुश नहीं तो किनारे बैठ कर रोते थे।
उसकी एक तस्वी…
“अरे बस भाई”, वो हमारी बात काटते हुए बोला, “मैं समझ गया कि पहले क्या-क्या करते थे। पर इससे फ़ेसबुक और जिंदगी का क्या लेना-देना है?
“वही तो मैं बता रहा हूँ की पहले दुनिया में फ़ेसबुक था और अब फेसबुक में दुनिया है।
अब झगड़े फ़ेसबुक पोस्ट पर होते हैं और समझौते comments में।
अब आखिरी डैस्क तो छोडो, बेस्ट फ्रेंड का जन्मदिन भी नोटिफिकेशन देख के याद आता है। उसकी वॉल पर तुम ‘Happy Birthday’ लिख कर केक की तस्वीर तो भेज देते हो पर उस असली केक का मज़ा अब कहाँ।
पहले उसका इंतज़ार करते थे कि कब वो क्लास में घुसेगी और अब दिन में दस बार उसका प्रोफाइल चेक करते हो कि एक बार तो ऑनलाइन दिखे।
दोस्त को किस लड़की के नाम से चिढाना है तो छोडो तुम्हें पता भी नहीं होता है और दोस्त का स्टेटस ‘in a relationship’ हो जाता है।
अब तो propose भी मैसेंजर में होता है यारा और ‘we are just good friends’ भी।
और अब तुम रोते नहीं हो, उससे नज़रें नहीं चुराते। बस उसे unfriend या block कर देते हो।
यार प्यार भी फ़ेसबुक पर हो रहा है और ब्रेकअप भी। बर्थडे भी फ़ेसबुक पर हो रहा है और फ़ेसबुक पर ही दम भी घुट रहा है। आंदोलन भी फेसबुक पर हो रहे हैं और लाठीचार्ज भी। फ़ेसबुक पर ही देशभक्त भी तैयार हो रहे हैं और फेसबुक पर ही गद्दार भी।
मेरे भाई, देश कैसे चलेगा, ये नीतियां संसद में कम फेसबुक पर ज्यादा discuss होती हैं।
तुम्हारे drawing room की कुर्सी से लेकर संडास की सीट तक, आज हर जगह है फेसबुक।
और तुम पूछ रहे हो कि क्या लेना-देना है फ़ेसबुक और जिंदगी का।”
“हाँ भाई, ठीक है। मान लिया कि फेसबुक ही जिंदगी है। पर एक बात बताओ कि ज़िन्दगी का मकसद क्या है फिर? Status Update करना?” वो व्यंगात्मक स्वर में बोला।
“नहीं, Scroll करना”, हमने एक हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“Scroll करना?”
“हाँ”
“समझाओगे इसका मतलब?”
“बिलकुल। देखो, फ़ेसबुक पर दुनिया भर के लोग दुनिया भर की मूर्खता करते हैं।
और सिर्फ मूर्खता ही नहीं अखंड-अद्वितीय मूर्खता।”
“हाँ वो तो है”
“तो जब तुम उन मूर्खताओं को देखते हो तो गुस्सा आता है कि लोग कैसे अपना समय इन बेकार के कामों में बर्बाद करते हैं।
और सिर्फ गुस्सा ही नहीं, बहुत गुस्सा आता है लगता है कि साला मोबाईल तोड़ दो, कंप्यूटर में आग लगा दो। पर ऐसा करने में तुम्हारा ही नुकसान है, फिर तुम क्या करते हो?”
“क्या करते हैं?”
“Scroll… Scroll करते हो और उन मूर्खताओं को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाते हो। क्योंकि अगर हर उन मूर्खताओं पर रुककर comment में तुम अपना गुस्सा निकालने लगे तो पूरा data सिर्फ गुस्सा निकालने में ही उड़ जाएगा।”
“हाँ ये तो सच है। पर ये तो फेसबुक पर करते हैं न। ज़िन्दगी के मकसद का क्या?”
“अरे अभी तो बताया न कि फ़ेसबुक ही जिंदगी है। जैसे फेसबुक पर तुम रुक कर हर एक मूर्ख की हरकतों पर टिप्पणी नहीं दे सकते और scroll कर के आगे बढ़ जाते हो वैसे ही जिंदगी में भी बहुत मिलेंगे जो पूरी कोशिश करेंगे कि तुम्हरा समय खराब हो। तुम्हे रोकेंगे, तुम्हे गुस्सा दिलाएंगे और मजबूर करेंगे ये सोचने पे की जहाँ तुम हो वही तुम्हारी मंज़िल है। पर तुम्हे अपने दिल की सुननी है। तुम्हे रुकना नहीं है। अपना data बर्बाद नहीं करना है और जिंदगी का data तुम्हारा समय है, तुम्हारी मानसिक और शारीरिक योग्यता है। तुम्हे बढ़ते रहना है। आगे की ओर। ज़िन्दगी भर। चाहे जो हो जाये। बस scroll करना है क्योंकि आगे बढ़ना मुश्किल नहीं है, scroll करना मुश्किल नहीं है। बस यही तो ज़िंदगी का मकसद है कि अपने दिल की सुनो और कभी न रुको। समय की तरह। चलते रहो, बस चलते रहो।”
अब आकाश समझ चुका था। उसे समझ में आ गया था- ज़िन्दगी का मतलब और मकसद। पर एक सवाल अब भी उसके मन में था और बिना रुके उसने तपाक से वो सवाल दाग दिया।
“यार इतना तो मेरे समझ में आ गया पर अगर जिंदगी फेसबुक है तो फिर भगवान् क्या है?”
हमने अपना माथा पकड़ लिया और मन ही मन बोले की इस मूर्ख को अब ये भी समझाना पड़ेगा। फिर हमने सोचा और एक शब्द में उत्तर दिया।
“भाई अगर जिंदगी फ़ेसबुक है तो भगवान तो एक ही हो सकता है”
“और वो कौन?”
“ज़करबर्ग बाबा”
“ज़करबर्ग बाबा??”
“हाँ… ज़करबर्ग बाबा कैलिफोर्निया वाले।”
हम दोनों हंसने लगे। वो अगला सवाल दागता कि हमने उसे रोक दिया।
“यार आज के लिए बस बहुत हो गया, बाकि ज्ञान फिर कभी”, हमने मुस्कुराते हुए कहा।
वो उठ के जाने लगा तो हमने रोका, “अरे सुन”
“हाँ”
“ये सब सिर्फ समझाने के लिए था। फेसबुक ज़िन्दगी नहीं है। अपने आस पास देख। ये है ज़िन्दगी। इसे जी। जो मन में आता है कर। चल Bye. ”
उसने हंस के हमसे bye किया और चला गया।
By Jwala

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