Kitabein
- Hashtag Kalakar
- Jan 23, 2025
- 1 min read
By Vikas Pandey
किताबें कभी खरीदी नहीं जातीं, उन्हें माँगा जाता है, एक वादा लेकर— वापस करने का, जो अक्सर अधूरा रह जाता है, बाकी सारे वादों की तरह। हर पन्ना गवाही देता है किसी अधूरे संवाद की, किसी उधार लिए हुए ख़्वाब की। कभी-कभी किताबें हमारी आँखों में ठहरे अनकहे शब्दों की तरह होती हैं, जो लौटकर कभी नहीं आते। किताबें झूठ नहीं बोलतीं, लेकिन उन्हें माँगने वाले कभी-कभी सच भूल जाते हैं। वो किताबें जो वापस नहीं लौटतीं, उनमें छूट जाता है माँगने वाले का एक हिस्सा, और ले जाती हैं देने वाले का एक। शायद इसलिए किताबें कभी सिर्फ़ पन्ने नहीं होतीं, वो रिश्ते होती हैं, जो उधार लिए जाते हैं और अक्सर लौटाए नहीं जाते।
By Vikas Pandey

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