Khoya Ishq
By Anurag Nigam
कहीं गुम है शायद अब वो इश्क,
जो कभी सरेआम दिखता था...
गुदगुदी करता, खड़ा कहीं दूर हँसता,
वो हमारे लफ्जों पर साफ दिखता था...
आहें भरता, सपने दिखाता,
कोसों दूर होते हुए भी इक दम करीब दिखता था...
रुलाता हँसाता न जाने क्या क्या कराता,
वो इश्क ही था जो कहीं खुलेआम दिखता था...
अक्खड़ रवैया, बेखौफ नजर,
मानो सिर्फ मेरा है, सबको खुलेआम दिखता था...
कहीं गुम है शायद अब वो इश्क,
जो कभी सरेआम दिखता था…||
By Anurag Nigam

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