Kavita ki nayi shuruwaat
By Kavita Batra
। पक्का ।
कलम से बात हुई , तो स्याही ने अपना रंग पक्का करा ।
जब बात हुई कागज से , तो जज्बातों ने अपना रंग पक्का करा।
कोई दिमाग से मेला बना रहा था , तो कोई दिल से अपनो का मेला पक्का कर रहा था।
कविता
। सफर ।
सफर बाहर का नहीें, सफर भीतर का हे ।
उलझने बाहर कि नहीं , सुलझाना भीतर को हे।
माटी हे ,माटी से हवा बन जाना हे ।
यह दिवानगी तो हमारी रुह कि हे जिसने उस परवरदीगार के घर जाना हे।
कविता
। मस्त मलंग |
मुश्किल यह नहीं, कि क्या किसे , केसे चाहते हो । मुश्किल हे ईन उलझनौ में अपने आप से क्या चाहते हो ।
यह कागज़ी दुनिया हे , यहां सब रिश्ते कागज से बनते हैं ।
मां बाप कि वसीयत ऑर कुछ पेसो के सौदागर बनते हैं। नासमझ समझते हैं मुझे , जो मस्त मलंग जिते हें, ऊस ऊपर वाले के रंग में मग्न , फकीर भी शनशाह बनते हैं।
कविता
। जज्बात ।
हम कलाकार हैं, हमें नशे में समझते हो ।
हम जो भी बात करें, या टिपणी करें उसे हवा कर देते हो।
इनसे कोई यह क्यों नही पूछता , क्या तुम लिख पाते हो, जिसे जिते हो ।
अजी जरा गौर फर्माइ ऐ , हम कलाकार हें, हम महफिल तेरी याद से , तेरे किस्से से बनाते हैं, नहीं तो क्या तुम ऊन जज्बातोो को अल्फाज दे पाते हो ।
कविता
। इत्तेफाक ।
मुझे इत्तेफाक बहुत पसंद हैं ,
लेकिन हसीन हौ तो क्या बात हो ।
मुझे इत्तेफाक से बने एहसास पसंद हे ,
लेकिन ऊम भर हो तो क्या बात हो ।
मुझे इत्तेफाक से बने किस्से पसंद हे
लेकिन वो लम्हे तेरे साथ हो तो क्या बात हो।
कविता
। बस्ती ।
कलाकारों कि बस्ती नहीं होती जनाब,
यह जहां होते हैं रौनक ऑर महफिलें इनसे होती हैं जनाब।
तुम कदर ना करो तो भी सही , ना करो तो भी सही ,
हम अपनी रूहानी अंदाज में मस्त मलंग रहते हैं जनाब ।
जहां चाहें वहां बना लेतें हैं कारवां, कुछ लफ्जों से तो कुछ आंखो से अयंआ कर आते हैं जनाब ।
कविता
। तुम और हम ।
तुम मर्म लगाने का वादा तो करो ,
हम रोज ज़ख्म कुरेदंगै ।
तुम बात तो करो हमारे इलाज कि ,
हम रोज अपनी नवज ,तेज़ -धीमी कर लेंगे ।
तुम सिर्फ बात तो करो साथ चलने का ,
तुम सिर्फ बात तो करो साथ चलने का ,
हम हर पल अपने सफर को लम्बा कर लेंगे ।
कविता
। तेरे साथ कि चाय ।
ना जाने अलविदा केसे कर पाएंगे,
यह सोचा ही नही था , कि तेरे ही शहर में घर बना लेंगे । रूबरू होंगे तुम और सलाम ना कर पाएंगे ,
यह सोचा न था कि तेरी खैरियत अब प्रार्थनाओं में मांगा करेंगे ।
चाय से अब जुर्रत से ज्यादा वफ़ादारी का रिश्ता निभा रहें हैं,
यह सोचा न था कि तुम न आओगे ,मगर हम तब भी तेरे याद मे दौ कप, में चाय पिया करंगे ।
कविता
। अपने आप के ।
अपने ही शहर में , अब तुम तन्हा हो चले हो,
अपने ही नाम से बेशक लेकिन फितरत से जुदा हो चले हो ।
क्या ढूंढ रहे हो मंदिर, दरगाह ओर गुरुद्वारे में?
अपना सुकून या खुद कि तलाश कर रहे हो ।
शहर भी तेरा है पहचान भी तेरी हे, फिर क्यूं बेचैन हो रहे हो ।
ऐसा क्या खौ दिया हे, जिसे पाने कि तलाश में रौज एक कशमकश सै गुजर रहै हौ।
क्या करना हे यह जानकर कि सब क्या सोचते हे , अगर तुम अपने आप के न हुये तो क्या खाक जीवन जीते हो ।
कविता
By Kavita Batra

Comments