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Kavita ki nayi shuruwaat

Oct 1, 2022
3 min read

By Kavita Batra


। पक्का ।

कलम से बात हुई , तो स्याही ने अपना रंग पक्का करा ।

जब बात हुई कागज से , तो जज्बातों ने अपना रंग पक्का करा।

कोई दिमाग से मेला बना रहा था , तो कोई दिल से अपनो का मेला पक्का कर रहा था।


कविता



। सफर ।


सफर बाहर का नहीें, सफर भीतर का हे ।

उलझने बाहर कि नहीं , सुलझाना भीतर को हे।

माटी हे ,माटी से हवा बन जाना हे ।

यह दिवानगी तो हमारी रुह कि हे जिसने उस परवरदीगार के घर जाना हे।


कविता





। मस्त मलंग |


मुश्किल यह नहीं, कि क्या किसे , केसे चाहते हो । मुश्किल हे ईन उलझनौ में अपने आप से क्या चाहते हो ।

यह कागज़ी दुनिया हे , यहां सब रिश्ते कागज से बनते हैं ।

मां बाप कि वसीयत ऑर कुछ पेसो के सौदागर बनते हैं। नासमझ समझते हैं मुझे , जो मस्त मलंग जिते हें, ऊस ऊपर वाले के रंग में मग्न , फकीर भी शनशाह बनते हैं।


कविता


। जज्बात ।


हम कलाकार हैं, हमें नशे में समझते हो ।

हम जो भी बात करें, या टिपणी करें उसे हवा कर देते हो।

इनसे कोई यह क्यों नही पूछता , क्या तुम लिख पाते हो, जिसे जिते हो ।

अजी जरा गौर फर्माइ ऐ , हम कलाकार हें, हम महफिल तेरी याद से , तेरे किस्से से बनाते हैं, नहीं तो क्या तुम ऊन जज्बातोो को अल्फाज दे पाते हो ।


कविता



। इत्तेफाक ।


मुझे इत्तेफाक बहुत पसंद हैं ,

लेकिन हसीन हौ तो क्या बात हो ।

मुझे इत्तेफाक से बने एहसास पसंद हे ,

लेकिन ऊम भर हो तो क्या बात हो ।

मुझे इत्तेफाक से बने किस्से पसंद हे

लेकिन वो लम्हे तेरे साथ हो तो क्या बात हो।


कविता


। बस्ती ।


कलाकारों कि बस्ती नहीं होती जनाब,

यह जहां होते हैं रौनक ऑर महफिलें इनसे होती हैं जनाब।

तुम कदर ना करो तो भी सही , ना करो तो भी सही ,

हम अपनी रूहानी अंदाज में मस्त मलंग रहते हैं जनाब ।

जहां चाहें वहां बना लेतें हैं कारवां, कुछ लफ्जों से तो कुछ आंखो से अयंआ कर आते हैं जनाब ।


कविता



। तुम और हम ।


तुम मर्म लगाने का वादा तो करो ,

हम रोज ज़ख्म कुरेदंगै ।

तुम बात तो करो हमारे इलाज कि ,

हम रोज अपनी नवज ,तेज़ -धीमी कर लेंगे ।

तुम सिर्फ बात तो करो साथ चलने का ,

तुम सिर्फ बात तो करो साथ चलने का ,

हम हर पल अपने सफर को लम्बा कर लेंगे ।


कविता



। तेरे साथ कि चाय ।


ना जाने अलविदा केसे कर पाएंगे,

यह सोचा ही नही था , कि तेरे ही शहर में घर बना लेंगे । रूबरू होंगे तुम और सलाम ना कर पाएंगे ,

यह सोचा न था कि तेरी खैरियत अब प्रार्थनाओं में मांगा करेंगे ।

चाय से अब जुर्रत से ज्यादा वफ़ादारी का रिश्ता निभा रहें हैं,

यह सोचा न था कि तुम न आओगे ,मगर हम तब भी तेरे याद मे दौ कप, में चाय पिया करंगे ।

कविता


। अपने आप के ।


अपने ही शहर में , अब तुम तन्हा हो चले हो,

अपने ही नाम से बेशक लेकिन फितरत से जुदा हो चले हो ।

क्या ढूंढ रहे हो मंदिर, दरगाह ओर गुरुद्वारे में?

अपना सुकून या खुद कि तलाश कर रहे हो ।

शहर भी तेरा है पहचान भी तेरी हे, फिर क्यूं बेचैन हो रहे हो ।

ऐसा क्या खौ दिया हे, जिसे पाने कि तलाश में रौज एक कशमकश सै गुजर रहै हौ।

क्या करना हे यह जानकर कि सब क्या सोचते हे , अगर तुम अपने आप के न हुये तो क्या खाक जीवन जीते हो ।


कविता



By Kavita Batra





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