Kar Lo Yakin Mera
By Dushyanth Goswamy
पलकों पे जब अंधेरा होगा, ख़्वाबो के जहाँ का सवेरा होगा
उम्मीद का फिर बसेरा होगा, कहीं दूर जब किनारा होगा
कर लो यक़ीं मेरा
पलकों पे जब अंधेरा होगा, ख़्वाबो के जहाँ का सवेरा होगा
नाराज़ हो तुम क्या ग़म है? ये आँखें फिर क्यों नम है?
ये मोती होंठ से छू लू, इतनी चाहत क्या कम है?
पल जो ये चला गया ग़म भी ये ठहर नहीं पाएगा।
कर लो यक़ीन मेरा
पलकों पे जब अंधेरा होगा, ख़्वाबो के जहाँ का सवेरा होगा
कोई माने या ना माने, कहते है ये परवाने।
तेरी इक हसी के बहाने, बनते लाखों अफ़साने
सब को आज़मा लिया, ख़ुद को एक मौक़ा तो दो ना।
कर लो यक़ीन मेरा
पलकों पे जब अंधेरा होगा, ख़्वाबो के जहाँ का सवेरा होगा
उम्मीद का फिर बसेरा होगा, कहीं दूर जब किनारा होगा
कर लो यक़ीन मेरा
पलकों पे जब अंधेरा होगा, ख़्वाबो के जहाँ का सवेरा होगा
By Dushyanth Goswamy

Comments