Jhansi Ki Rani
By Saurav
आजादी के पन्नो पे जब हो तो कभी इतिहास रही थी,
रणभूमि के मंदिर में वो झाँसी वाली बात कहा थी।
मर मिटने का ज़ज़्बा था, वो फ़ितूर भी सूफ़ियाना था,
धरती माता को उसने मातृभूमि ही माना था।
गुरु जिसके तात्या थे, वो तिरंदाज़ ही बाला थी,
कच्ची उम्र से ही वो तलवारों से खेली थी।
माटी का अभिमान जहां था, धरती का स्वाभिमान वह था,
बाजीराव की "छबेली" ने ही आजादी का हुंकार भरा था।
सोचा ना था महारानी का,
एक ही सपना आजादी का,
अंग्रेजों को मार भगाकर हिंदुस्तान का ध्वज लहरने का।
जिसके जिगर में आग लगी थी, आजादी की चाहत थी,
धरती माता के चरणो में जिसकी संपूर्ण जीवन न्योछावर थी।
काप उठे थे फिरंग उसी से मां काली का अवतार वही थी,
प्रचंड रूप थी दुर्गा की वो,
मातृभूमि की शान वही थी।
वीरो में भी वीर थी वो,
अंदाज़ जिसका बेसुमार था,
स्वर्ण अक्षरो से लिखा है,
वीरांगनालक्ष्मीबाईजिसकानामथा
By Saurav

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