Ishq Samajh Baithe Hum
By Dr.Shubham Hiremath
इज़्तिरार थके हाथों ने हमारे कन्धों के लिये सहारे को
कुछ पाने की नियतसे ली हुई हमदर्दी के सिसकियों को
उसकी दोस्ती की उल्फ़त समझ बैठे हम!
रूहानी वफा छिड़कती हुईं उन बेवफ़ा नज़रों से
कुरबति से हर ईक गाल खिंचने की उसकी आदत से
खुद को ‘आम’ से ‘ख़ास’ समझ बैठे हम!
खिलती मेहँदी को दिखाके , बेचे हुए सौदे को
आँखों के आँसू पिलाक़े, बोझ हटाने की मजबूरी को
हमसफर साथ नई ज़िंदगी की धून समझ बैठे हम!
परिवर्तन की उम्मीद और अच्छे दिन के सपनों से
नमो का मंत्र जपते,बच्चों की ख्वाहिशें कुचलते हुए
‘बारिश के गुलाम’ ,बेवजह जान गवाँ बैठे हम!
सामने ज़ुकते सलामों को इनायत समझ बैठे हम
मुंतज़िर षड्यंत्रो और दोहरी नकाबों से गुमराह रहे हम
उठती उंगलियों के तादाद देख ‘शौहरत’ समझ बैठे हम!
हमारी बुरी आदतों पर उसकी बेवज़ह ऐतराज को
बिन बताये हर बात जानने की उसके हुनर को
कम्बख्त ‘तनहाई’ थी पर ‘इश्क़’ समझ बैठे हम!
By Dr.Shubham Hiremath

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