Insaaniyat
- Hashtag Kalakar
- Aug 16, 2025
- 1 min read
By Vinita Tiwari
इंसान हूँ मैं, इंसान ही बने रहना चाहता हूँ
मज़हब न बाँट सके जिसे, परिंदा वह बन उड़ना चाहता हूँ
न धरती, न आसमान पूछे धर्म मेरा,
हवा भी है कहती न कोई मज़हब मेरा…
तुझे भी न बख्शा मगरूरियत के दीवानों ने,
बाँट दिया अल्लाह, राम, रहीम के नामों में...
दर्द और तकलीफ़ तो देता इंसान है,
जात और मज़हब तो यूँ ही बदनाम हैं...
इंसानियत कहाँ मैं ढूंढूँ इस जहाँ में,
खुद को ही भगवान समझ बैठा इंसान है...
सीखना चाहता हूँ उन नदियों, उन दरख़्तों से...
पूछूँ न हाथ बढ़ाने से पहले तू कौन है मेरा
प्यार करने से पहले न पूछे कोई धर्म मेरा...
दुआ में बस यही माँगना चाहता हूँ
इंसान हूँ मैं, बस इंसान ही बने रहना चाहता हूँ।
By Vinita Tiwari

Wow
Fabulous
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Nice
Nice one