Hum Milenge
By Deepak Malik
किसी रोज़ साँझ के गलियारे में हम बैठेंगे और बातें होगी कुछ अनसुनी उनकही सी ना जाने कितनी सारी होगी
दूर कही पानी की कलकल थोड़ी सर्द हवा की सनसन घर लोटते पंछियों की क़तार अनगिनत तारों की चादर कहीं जमीं का कोना पकड़े हम खुले आसमाँ को ताकते रहेंगे हम तुम किसी साँझ ज़रूर बैठेंगे साँझ का ढलना कहूँ या अनेको बेख़रे इंद्र्धनुष कहूँ सब नज़रों से दूर बस हम होंगे शहर के शोर से परे एक खामोशी में हम होंगे हम तुम किसी साँझ ज़रूर बैठेंगे
By Deepak Malik

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