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Hindi Muktak.. Patriotic Poetry

Oct 17, 2022
5 min read

By Surendra Kumar Sharma


(1) मुक्तक : देशप्रेम


(1)

हमारे देश में भगवन हरिक इंसान चंगा हो ।

जुबां पर बोल हों मीठे हृदय में मात‌ गंगा हो।

दिलों में प्रेम की गंगा बहाते सब चलें हर पल -

सभी के हाथ में शोभित सदा अपना तिरंगा हो।


(2)

तिरंगा हाथ में लेकर मैं जन-गण गान गाता हूं।

मेरी सांसों में धड़कन में नये प्रतिमान पाता हूं।

मेरी धरती की माटी का तिलक माथे लगाकर मैं-

मैं भारत देश को माता-पिता, भगवान पाता हूं।


(3)

हमारा काम ऐसा हो कि अपनी शान बन जाये।

हमारा आचरण-व्यवहार ही पहचान बन जाये।

तिरंगा हाथ में हो और लबों पर मातरम वन्दे-

हमारा पान सा दिल अब कि हिन्दुस्तान बन जाये।



(2) मुक्तक


(1)

जैसे हर घर पावन गंगा |

शहर,गली हर गाँव सुरंगा |

बाँटें अपना प्यार सभी को-

घर-घर में लहराये तिरंगा |


(2)

अमृत उत्सव चलो मनायें |

आजादी पर बलि-बलि जायें|

भारत माँ के उठो लाड़लों-

चलो तिरंगा हम फहरायें |


(3)

मातृभूमि के मनहर छौनों,

तीन रंग बरसा दो |

भारत माँ के भाग्य विधाता,

हर घर को सरसा दो |

ऐसी अलख जगादो घर-घर,

हर आँगन मुस्काये -

देशप्रेम के गीत अधर रख,

सबके मन हर्षा दो |


(4)

मेरे देश तुम्हारी जय हो |

नहीं लेश भर सरगम क्षय हो |

प्राणों में गूँजें सुर इसका -

भारत माँ की जय-जय जय हो |


(3) गीत

हमारा भारतवर्ष महान्!


हमारा भारतवर्ष महान्।

हमारा भारतवर्ष महान्।

अमृत उत्सव मना रहे हम,

है इसकी संतान |





स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित है,

इसकी ऊंची शान।

हर कण माटी का गाता है,

इसका गौरव गान।

हमारा भारतवर्ष...


कंकर-कंकर में शंकर है,

राम-कृष्ण गौतम का घर है।

धरती सोना उपजाती है,

ये रत्नों की खान।

हमारा भारतवर्ष...


हिमगिरि मुकुट बना है इसका ,

सागर पग धोता है जिसका।

जन्मभूमि, जय मातृभूमि जय,

अलग सदा पहचान।

हमारा भारतवर्ष...


(4)


गीत : जगमग जोत जलाई


धर्म और मानवता से,

हमने पहचान बनाई।

सत्य-अहिंसा की हमने ही,

जगमग जोत जलाई।


सारे जग को भाईचारा,

हमने ही सिखलाया।

दिल से दिल तक सेतु बनाकर,

विश्व-बन्धुत्व दिखाया।


गौतम, नानक, महावीर ने,

प्रेम की नदी बहाई।

सत्य-अहिंसा...


कर्मयोग का योगेश्वर ने,

हमको पाठ पढ़ाया।

मर्यादा का मंत्र राम ने,

हम सब को बतलाया।


सब स्वारथ में डूब गये ,

कुछ देता नहीं दिखाई।

सत्य-अहिंसा...


काल खड़ा सब देख रहा है,

युग परिवर्तन होगा।

भोग पड़ेगा वह भोगना,

जो अब तक नहीं भोगा।


युग-युग याद रहेगी हमने,

जो यह रीत चलाई।

सत्य-अहिंसा...


(5 )


गीत : गांधी जी क्यों चुप रहते हो

*

गांधी जी क्यों चुप रहते हो,

चुप रहकर सब कुछ सहते हो।

*

देखो अपनी आंखें खोलो,

सारे मंजर बदल रहे हैं।

हंसते थे जो लोग कभी वो,

उनके नयना सजल रहे हैं।

देख घृणा को क्या कहते हो।

गांधी जी क्यों चुप रहते हो।।

*

झूठ सत्य में आकर खोई,

और अंहिसा पग-पग रोई।

चरखा बापू टूट गया है,

खादी का संग छूट गया है।

बिगड़े हाल देखकर हर दिशि,

क्या गाँधीजी तुम दहते हो।

गांधी जी क्यों चुप रहते हो।।

*

राम राज्य के तुम संवाहक,

सपनों का यह देखो भारत।

हम खुश होते थे जो नाहक,

बोझिल दिल से पढ़ी इबारत।

देख देख यह दिल रोता है,

क्या तुम अब भी ज्यों बहते हो।

गांधी जी क्यों चुप रहते हो।।

*


(6)


गीत :हमारा भारतवर्ष महान


हमारा भारतवर्ष महान


स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित है ,

भारत माँ की ऊँची शान।

कण - कण माटी का गाता है ,

मेरे देश का गौरव गान।

मुझको है इस पर अभिमान ।।


कंकर - कंकर में शंकर है ,

राम - कृष्ण- गौतम का घर है।

बचपन शेरों के सँग खेला,

नहीं किसी से हमको डर है |

धरा यह है रत्नों की खान।


हिमगिरि मुकुट बना है इसका ,

सागर पग धोता है जिसका।

नदियों की धारा गाती है ,

कल - कल गान सदा से मुस्का |

सदा ही अलग रही पहचान।

*

(7)

गीत ~नागफनी


हरसिंगार लगाया पर

उग आई नागफनी |


मुझको तो हर मग पर ही,

काँटों का साथ मिला |

हवन किया जब-जब भी मैंने,

तब ही यह हाथ जला |

इसीलिए मेरी तो सबसे,

पग-पग पर रही ठनी ||


हर मग, हर पग लड़ा बहुत हूँ,

खुद से या अपनों से |

उम्मीदें भी रखीं बहुत है,

छितराये सपनों से |

इसीलिए मेरी तो सचमुच,

खुद से ही नहीं बनी ||


जो चाहा वो मिला कहाँ है,

हर युग में इस जग में |

काँटें ही बिखरे पाये हैं,

मैंने तो हर मग में |

साँसों की वीणा टूटी पर,

दुर्गम यही राह चुनी ||

*

(8)

गीत :

तुम मुझको आवाज़ न देना


जीवन अब तक समझ न आया |

कितने नाच नचाती माया |

अपने दर्द कहाँ तक बाँटू ~

थकी-थकी सी है यह काया |

अपना तो है बस ये कहना |

तुम मुझको आवाज़ न देना ||


मन ने की अब तक मनमानी |

राहें कितनी हैं अनजानी |

ढूँढ रहा हूँ जाने किसको ~

नहीं किसी का कोई सानी |

चलते रहना है मुझको तो-

तुम मुझको आवाज़ न देना


रंग बदलते लोग यहाँ हैं |

आपस के वे संग कहाँ हैं |

चेहरे उतर रहे छिलकों से~

कभी यहाँ हैं कभी वहाँ हैं |

नहीं किसी से लेना-देना |

तुम मुझको आवाज़ न देना ||


(9)

गीत:


मैंने कितने गीत लिखें हैं,

अपने मन की अभिलाषा में |

सांसें खुद जब संवाहक हो,

मौन चिरंतन की भाषा में ||


मन में आशा दीप जलाये,

द्वार खड़ा हूँ इंतजार में |

मैंने हर पल दृग धौयें हैं,

तन्हा आँसू लिए प्यार में |

देख रहा हूँ कब आओगी ,

घर-आँगन में इस आशा में ||


मृदु सपनों की सेज सजाए,

देख रहा हूँ प्रियतम आए |

कितने महल बनाये मैंने,

हर पल नजरों में वे छाए |

डूब न जायें वो पल भर में ,

जीवन की इस परिभाषा में ||


साँसों की सरगम पर मैंने,

कितने राग बजाए - गाए |

धड़कन की सौगंध उठाकर,

तुम संँग कितने स्वप्न सजाए |

पूरी हो जब चाहत मन की,

संचित प्रिय हर जिज्ञासा में ||

****


(10)

गीत:


प्यारअगर हमको दिखता तो


प्यार अगर हमको दिखता तो ,

उसका चेहरा कैसा होता ।

भोली - सी सूरत होती और ,

एक फरिश्ते जैसा होता ।।


बंसी की धुन में कान्हा के ,

राधा सँग वृन्दावन होता ।

ग्वाल- बाल बन रास रचाता ,

गोप - गोपियों सा तन होता ।

हाथ मदद के लिए उठाता ,

कदम मदद के लिए बढ़ाता ।

दर्द दूसरों का कम करता ,

वह नारायण जैसा होता ।


कान दर्द उसका सुन लेता ,

आँखें दर्द समझती सबके ।

भरत मिलाप हो रहा जैसे ,

गले मिल रहे हों हम रब के ।

श्रद्धा और विश्वास समेटे ,

रूप मनोहर ऐसा होता ।

मुस्काता उपवन में जैसे ,

मधुर सुमन के जैसा होता ।


राम - कृष्ण गौतम - सा जग में ,

विश्व प्रेम कण - कण में बोता ।

शबरी के जूठे बेरों संग ,

दिव्य प्रेम में नयन भिगोता ।

प्रभु का सरयू पार उतरना ,

केवट प्रेम झलकता होता ।

युग - युग कृष्ण - सुदामा जैसा ,

प्रेम पनपता वैसा होता ।


By Surendra Kumar Sharma




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