Hindi hai hum
By Deepak Malik
अनगिनत स्वपन की बोली हो या, खंडित मन की परिभाषा हो बखान प्रकृति की मोहकता का या, नीले नभ में उमड़े बादल हो वृक्ष की घनी छाया हो या,
कल कल बहती नदियों का स्वर हो अमावस की रात का अंधकार हो या, पूर्णिमा पर बिखरे चाँद की रोशनी हो शब्द में समेटे “माँ” सार्थक कहु तुझको की मेरी भाषा-बोली में “हिंदी” हो तुम गर्वित अनुभवित संक्षिप्त हो तुम “हिंदी” हो तुम...!
By Deepak Malik

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