Hai Kya Hum, Aakhir?
By Shruti Mishra
हम क्या कोशिश करते हैं
और क्या पाते हैं
परिस्थितियों से समझौता करके
ख्वाहिशों के पुलिंदे कंधो पर बांधे
हम निरंतर चलते जाते हैं
आगे बढ़ तो रहे हैं लेकिन कहाँ?
इस कशमकश में अक्सर उलझ जाते हैं
लेकिन हैं कौन हम?
चीनी के टुकड़े
जो आमूमन चाय में घुल जाते हैं
और प्यालो में बट कर
दिनों से भीतर दबी बातों के ज़रिए बाहर को निकल आते हैं
या वो नमकीन लहरें जो पत्थरों से टकराती हुई
अपने वर्चस्व की लड़ाई में विजयी हो
एक छोर से दूसरे छोर की खोज में
घर से बहुत दूर कही बह जाती है।
उन रास्तों पर चलते हुए मनज़िलों की ओर
अंजुमो में कही एक दिन खो जाना है।
है क्या हम, आखिर? इंसान ही तो।
मामूली, मासूम, भटके हुए से।
By Shruti Mishra

Comments