Gulshan Ko Kar De Ek Sa
By Kshitij Kawatra
गुलशन को कर दें एक सा कहने लगे हज़रात अब
यक रंग फूलों से सजे हो बिन महक बाग़ात अब
हमने न छोड़ी थी कसर जब बंदगी में रात दिन
भेजी दुआएँ ऐ ख़ुदा क्यों चुप खड़ा बे-बात अब
कहने लगी दुनिया के तुम उम्मीद रखना छोड़ दो
उम्मीद से क़ायम मगर धरती पे हैं सजदात अब
हर दिन नई इक आग दुनिया को जलाती थी दिखी
यूँ रूख बदल लाई हवा घर पर ये इम्कानात अब
यूँ तो सभी ने था सुना चर्चा हमारे वस्ल का
मौसम हुआ है हिज्र का हो शहर में बरसात अब
मैं तो सलीका ढूंढता था रिज़्क की इस दौड़ में
पर क्या सही और क्या ग़लत मक़्सद गुज़र-औक़ात अब
अल्फ़ाज़ हैं अंदाज़ है फ़िक्र-ए-रसा की है तलब
आवाज़ का कोई असर हो तो बने कुछ बात अब
By Kshitij Kawatra

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