Grah Klesh
By Bhagat Singh
सूरज ने कहा मै तो पश्चिम से निकलूँगा
बादल सा मदमस्त होकर धरा पर बिखरूंगा
उधर से चाँद बोल पड़ा
मै भी बहुत घूम लिया धरती के पीछे
कभी आगे-पीछे, कभी ऊपर-नीचे
क्या बस इसी के ही ब्रह्मांड में है ठाठ
सात तो अभी खोजे है और पुराने भी है ग्रह आठ
अब बस किसी और का दीवाना हो जाऊंगा
धरती को छोड़ औरो के दर भी चक्कर लगाऊँगा
शनि का सन्नाटा भी खत्म हुआ
कुछ करने का उसका जतन हुआ
कब तक पहनू इन छल्लों को
इन नव नादान निठल्लों को
पर्वत का ताज मै पहनूंगा, छल्ले धरती का ताज बने
मेरा पीछा छुड़ा दो बस, धरती छल्लों पर नाज करे
सही कहा सब सही कहा
ब्रहस्पति का आगमन हुआ
मै भी इतने चांदो को ढोकर, थक हूँ गया
इन सबको ले लो, दे दो मुझको एक चाँद नया
मंगल का गुस्सा भी भड़का
लाल सतह का हृदय धड़का
इतनी सदियो से प्यासा मै
मिलता है हर बार जिसे वो झांसा मै
नीर पृथ्वी का अंश मुझे कुछ दान करो
मरते से मुझमे भी अपना ध्यान करो
सबसे दूर कहीं कोने मे खड़ा, एक प्लूटो बेचारा
जात से बाहर हो बैठा, था वो किस्मत का मारा
बहुत हुआ, बस बहुत हुआ, कहाँ लगाऊ मै अर्जी
पृथ्वी-वीनस हम बहने है, पर चलती एक की ही मर्जी
जीवन का एक अंश दिया बस धरती को
जिसने हम सबको खोजा, ये ज्ञान दिया बस धरती को
बहुत हुआ ये ग्रह क्लेश
सबको दो सुविधा विशेष
सितारे भी बुदबुदाएं, चाँद के पड़ोस में घर दिलवा दो
जन्मो से बिछुड़े है, हमे भी मिलवा दो
धरा का था बस एक जवाब
शेख चिल्ली से न देखो ख्वाब
जिसको जो करना है करो
जो चाहे वो सब ले लो
पर ध्यान रहे, इंसा भी आएंगे संग में
ढालेंगे वो तुम सबको अपने रंग में
फिर मत कहना, ये ऐसे है ये वैसे है
पता नहीं किसने बनाया इन्हे, ये जैसे थे वैसे ही है
इन्होने ने मेरी भी कायापलट कर दी
अच्छी का तो पता नहीं, हालत खराब जरूर कर दी
सब ऐसे चुप हुए, जैसे साँप सूंघ गया
चुप्पी चारो और, सारा जोश नींद में ऊंघ गया
बिना बताए सब अपनी-अपनी जगह जाकर जम गए
उग्र विचारो की आंधी के सब बवंडर थम गए
दिन निकला और आँख खुली तो सूरज की किरणे गर्म ही थी
धरती के बिना, चाँद की आशिक़ी उसका भ्रम ही थी
रात हुई तो, चाँद पास और सितारे दूर ही थे
उनके बिखरे सपने चूर-चूर ही थे
पर दमक रहे थे, चमक रहे थे अपनी ही मस्ती में मस्त
धरती भी महक उठी, चहक उठी, सबको करके पस्त॥
By Bhagat Singh

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