Ghayal Pankh Hue Hai Hausle Nahi
By Rachana Rajasthani
जो ख़ामोशी को चीर के ना निकले वो तूफ़ान कैसा
और जो गिर के फिर से ना संभले वो इंसान कैसा
कविता का शीर्षक है "घायल पंख हुए हैं हौसले नहीं"।
एक पिंजरे में क़ैद एक चिड़िया
आसमान को बस देखती रहती
बाकी चिड़ियाओं को उड़ता देख
अपने पंख ना होने पर रोती रहती
सोचती मैं क्यूँ नहीं हूँ औरों जैसी
क्यूँ मुझमें कमी है ऐसी
बेबस लाचार पिंजरे में पड़ी
अपनी किस्मत को वो कोसती रहती
हालाँकि पंख थे उसके पास
पर किसी ने बतायी नहीं उसे ये बात
पिंजरे में कभी पंखों को खोल ना पाई
वो भी उड़ सकती है ख़ुद को कभी ये बोल ना पायी
आसमान उसे अच्छा लगता था
मन ही मन प्यार करती थी उससे
पर कभी छू नहीं पायेगी उसको
इसलिये कुछ कहने को डरती थी उससे
सोचती काश अपने भी दो पर होते
तो इस आसमान की बाहों में उठते
अपने भी वो सर होते
तभी अचानक एक दिन पिंजरा किसी ने खोल दिया पर वो उड़ ना पाई
पंख होके भी उसके पास ख़ुद से कभी वो लड़ ना पाई
सोचती मैं लाचार हूँ पंखों से बेज़ार हूँ
उड़ूं कैसे इस आसमान में
मैं तो हर तरह से बेकार हूँ
और किस्मत को भी उसपर तरस ना आया
अचानक कहीं से उड़ता हुआ एक बाज आया
चिड़िया पर झपटा, पंजे में पकड़ा और ऊपर आसमान में उड़ा लाया
नोंच के खाने को चिड़िया को बाज ने था शिकार बनाया
पर अगले ही पल जैसे ईश्वर का उपकार हुआ
यक़ीन न आया चिड़िया को ऐसा चमत्कार हुआ
एकदम से बाज की नियति उससे रूठ गयी
पकड़ ढ़ीली पड़ी और चिड़िया उसके हाथ से छूट गई
खुद को चिड़िया ने जब गिरता पाया
तब उसे अपने पंख होने का एहसास आया
एकदम से खोल के पंखों को हवा में उसने यूँ फैलाया
खुशी का ना रहा ठिकाना उसे
आज़ादी ने कर दिया दीवाना उसे
फिर जो उसने उड़ान भरी
अपने सपनों को पूरा करने उड़ी
भूल कर पिछली ज़िंदगी को
पहली बार हुई अपने पैरों पर खड़ी
कल तक किस्मत को कोसने वाली
आज अपनी तक़दीर पर इतराने लगी
कल तक आँसू बहाने वाली
आज अपनी मुस्कान के मोती गिराने लगी
देखते देखते आसमान से उसका प्यार परवान हो गया
आसमान की गहरी बाहों में बस उसका कहीं दिल खो गया
पूरी ज़िंदगी आसमान के साथ रहने के वादे पे
वो सपने पिरोने लगी उसके साथ ज़िंदगी बिताने के
अभी तो लेकिन रास्ते की शुरुआत थी
मंजिल मिलने तक ना जाने कितनी और मुश्किलों से मुलाकात थी
की अभी कुछ ही वक़्त गुज़रा था उसे मुस्कराते हुए
इतने में एक शिकारी आया कहीं से इतराते हुए
चिड़िया का उड़ना उसे रास न आया
फिर से नीचे गिराने को उसने निशाना लगाया
पंखो पर निशाना लगाया जो
तीर निशाने पर लगा वो
घायल ज़मीन पर गिरी इस तरह
फिर कभी ना हो पाई अपने पैरों पे खड़ी वो
हमेशा के लिए जैसे बिछड़ गए सब अपने
क्यूँ दिखाए ख़ुदा ने फिर आज़ादी के वो सपने
रहने देना था ना उसे क़ैद में इस भ्रम के साथ
कि नहीं है उसमें बाकी चिड़ियाओं जैसी कोई बात
हौसला दिला के हिम्मत छीन ली
उड़ना सिखा के उड़ाने छीन ली
न मिलती कभी आसमान से
ना होती प्यार की कोई बात
मिलके ना मिलना तो ऐसे है जैसे
बिना लकीरों वाले हाथ
क्या है अब फ़िर से मिलने की कोई आस
क्या आसमान नीचे आ सकता है
या वो जा सकती है फ़िर से उसके पास
क्या भर जाएगी फ़िर से अपने सपनों की उड़ान
या बीते लम्हों की याद में बस निकल जाएगी उसकी जान
पर तभी चिड़िया ने गर्दन उठाई
हालातों से लड़ने की हिम्मत जुटाई
घायल पंखो को फैलाकर
ऊपर पेड़ की डाल तक उड़ आई
बोली जितने भी इम्तेहान लेगा अब वो
करेगी हर इम्तेहान को पास
सोच से बड़ा कुछ भी नहीं
घायल पंख हुए हैं हौसले नहीं
हर बार लड़ेगी चाहे जितने भी आए तूफान
और हिम्मत नहीं हारेगी अब वो
अपने आप पर है उसे पूरा विश्वास
फिर से होगी अपने पैरों पर खड़ी वो
फिर हिलायेगी अपनी उड़ानों से पूरा आकाश
देखना फिर आसमान से उसका मिलन होगा
फिर से सुनहरा हर पल होगा
फ़िर लौटेंगी उसकी ज़िंदगी में भी ख़ुशियाँ
फ़िर से खड़ा उसके सपनों का महल होगा
By Rachana Rajasthani

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