Gentleman
By Priyam Gupta
मुझे बचपन से ही सुपरमैन बनने का बड़ा शॉक था।
आज मैं फिर बिल्डिंग कि छत से उड़ान भरने चला था,
पर ना जाने कब मेरा पैर फिसल गया,
और मैं बिल्डिंग नहीं, बेड से नीचे गिर गया।
पापा दौड़ कर मेरे कमरे में आए और मेरा सर सहलाया,
मुझे धीरे से सुपरमैन बनने का नुस्खा बताया!
“तू तो सुपरमैन है ना, और सुपरमैन रोते थोड़े हैं। रोयेगा तो सुपरमैन कैसे बनेगा?”
आज भी जब जिंदगी की गलियों में कहीं गिर जाता हूं,
ज़ख्मों पे चुप के से दवा लगा कर, सबके सामने मुस्कुरा कर दिखाता हूं।
"सुपरमैन कभी रोते नहीं", ये रो-रो कर खुद को याद दिलाता हूं।
मेरी गर्लफ्रेंड मेरे चुप रहने पर सवाल उठाती है,
अकसर मुझे निर्मम और भावहीन बताती है।
पर शायद उसे याद नहीं कि मैं अस्पताल कि महज़ सुइयों से डर जाता हूं,
रात को हॉरर फिल्म देखने के बाद, बाथरूम का दरवाजा आधा खोल कर सोने जाता हूँ।
बत्तमीज़ी का ख़िताब हमेशा मुझसे सिर्फ एक सीट दूर होता है,
जब बस में थक कर चूर हो के सीट किसी को न ऑफर करने का मन करता है।
काश जेंटलमैन बनने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोलना नहीं,
पर किसी को घर सुरक्षित पहुँचाना होता, तो शायद आज मैं भी एक जेंटलमै होता!
मुझे अच्छे कपड़े से नहीं, अच्छे व्यवहार से फरक पड़ता है,
सच बताऊँ तो मुझे भी एक दिन छुट्टी ले कर, घर पर रहने का मन करता है।
मैं जनता हूं की मैं मर्द हूं और वो एकऔरत है,
पर उससे मेरे घर पर रहने और उसके ऑफिस जाने से क्या ही फरक पड़ता है?
क्यूं मैं कपड़े पिंक न पहनूं, गाने भावुक न सुनूं?
खुशी और गम कि देहलीज पर रो ही क्यों ना पड़ूं?
मैं उसे प्रपोज़ करूँ या वो मेरे लिए गुलाब ले कर आए,
इस महीने मैं बिजली का बिल भरूँ और घर के बाकी सारे खर्चे वो उठाये ,
और इसके बाद भी मैं जेंटलमैन और सुपरमैन कहलाऊँ?
पर फिर वो कौन था जो उसे देर रात घर तक छोड़ने गया?
जो रोड हादसे के बाद किसी अंजान को हॉस्पिटल पहुंचा गया?
एक भूखे भिखारी को अपनी पॉकेटमनी से खाना खिला गया?
और अपनी जरूरत आधी कर के, घर पर पूरे पैसे थमा गया?
By Priyam Gupta

Comments