Galtiyaan
By Bhagat singh
मानते नहीं है
छानते नहीं है
एक दूसरे की
ढूँढने में ही
बस व्यस्त है
खामियाजा भुगतते है
भीतर-भीतर सुलगते है
जज़्बात बाहर आ ही जाते है
संग अपने बस घृणा लाते है
पछतावा भी होता है
अंदर विवेक सोता है
बिन सोचे कुछ भी बोलते है
जिव्हा में जहर घोलते है
भटके-भटके से
अधर में लटके से
बस एक टक तकते है
जिंदगी से थकते है
थक कर होश खो बैठते है
एक दूसरे से ऐंठते है
पर मानते नहीं है
छानते नहीं है
एक दूसरे की गलतियाँ
भंडार भरता र्है
आँसू झरता है
गीले आँसू सूंखते है
तन्हाई में डूबते है
रास फिर भी नहीं आती
इच्छाएँ अपना घर कर नहीं पाती
रूठते है के दूजा मान जाए
अहमियत उसकी भी जान जाए
कम से कम कमी का एहसास ना हो
टूट कर बिखरने का आभास ना हो
बस खुद के जीतने का जश्न ना हो
गुबार से अटा हुआ हुस्न ना हो
राख़ में लिपटा,शहद का गोला
मीठा पर किरकिरा सा अंजाम बोला
अब मान भी लो
एक दूसरे को पहचान भी लो
होती है हो जाती है
जिंदगी है चलती जाती है
गलतियाँ क्यों होती है ?
भावनाएं क्यों सोती है
अब तो
गलतियों का गट्ठर खुल ही गया
आँख में फँसा मैल धुल ही गया
फिर क्यों हो रहे हो अलग
बुझी सी राख़ में रहे हो सुलग
रात फरमान ला रही है
एक मंजिल दूर जा रही है
तलाश फिर किसी मंजिल की क्यों
हताश इतनी आसानी से हुए क्यों
सुबह का इंतजार तो कर लेते
पुरानी यादों के अतीत से तो डर लेते
देखते है, किसके नसीब में है
किसका कितना हिस्सा
गलतियाँ ही जानती है,
गलतियों का किस्सा ॥
By Bhagat singh

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