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Entries HTK

Feb 16, 2023
2 min read

By Kavita Duggal


Entry 1:


पुराने ज़ख्म


बात ज़ख्मों की चली, तो बात ये समझे तभी,

कुछ तो थे जो भर गए, पर कुछ दफ़न ज़िंदा अभी!


जो वक़्त लेकर भर गए, सीखों के दाग रख गए,

पर जो जिगर में दफ़न ज़िंदा, गहरी दरारें दे गए!


फिर जहाँ तक हो सका, रोती हंसी के झूठ में,

करते रहे हम भी बसर, ढक कर दरारें ओट में!


नज़रें मगर नापाक कुछ, और जबां चालाक कुछ,

ज़ख्म सहलाने की आड़ ले, कातिल बड़े वो हाथ कुछ!


पर समझ नियत की मासूम उन दरारों को थी कहाँ,

रोती बिलखती थीं वो कबसे, नज़रे करम को यहां!


शातिर लुटेरे हाथ वो, भर तो दरारों को गए,

रहमों करम पर उन नज़रों की, हम भी कुछ बह गए!


'देखें तो क्या हाल है" नज़रों ने पूछा दरारों से,

मरहम तो ना थी उनमें, भर गए जालिम बारूदों से!


जो छिपी थी वो दरारें, फट के खाईंयां अब बन गयीं,

दर्द छुपाने की कोशिश, वजूद की लड़ाई अब बन गयी!


तो दो तवज्जो जख्मों को आज, रहो चौकन्ने गहराती दरारों से,

बारूद लिए जो फिर रहे हैं, बच लो दोज़ख के सौदागरों से!



Entry 2:


सब आम है


वो सभी मैदान जो लगते थे मुश्किल लांघने,

वो सिकुड़ से क्यों गए, क्यूँ वो लगते आम हैं!


मेलों की रौनक देखने का बेसब्र सा वो इंतज़ार,

आज लगता बेमज़ा क्यूँ आज लगता आम है!


वो कतारों से लगे इनाम जो घर में मेरे हैं सजे,

याद धुंधला सी गयी, क्या वो मेरे नाम हैं!


कोहनियां छिल जाने से लेकर दिल के छील जाने के मोड़,

रास्ते सब देख गुज़रे, जख्म सब अब आम हैं!


बेखबर बचपन ने देखे जल्द बड़े हो जाने के ख़्वाब,

वो ना जाना ख़ास तो आगाज़ था, अंजाम बिलकुल आम है!












Entry 3:


बिखरती दीवारें


ओ बिखरती टूटती दीवारों रहने दो बुलंदी का गुमां ,

थामने की कोशिशों में ठोकरों का ज़ोर है!


जिनसे है तुमको दरारों की मरम्मत की उम्मीद,

कोई रहनुमा नहीं, तस्सलियों के चोर हैं!


तुमने क्या सोचा कि तुम सिमटी सवारी जाओगी?

खण्डरों को हटाने की साजिशें पुरज़ोर हैं!


क्या हुआ इतने बरस जो तुमने आशियाँ दिया?

तुम हो बीता वक़्त पर अब ताज़गी का दौर है!


हाँ मगर ये याद रखें जैसे हैं ये बेवफ़ा,

इनके नए ताज़ की बुनियादें कहीं कमज़ोर हैं!


By Kavita Duggal




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