Ek Adhuri Khwahish
By Srishti Shrivastava
वो चांद की धूमिल फिज़ाओं में नज़र भर के देखे, मेरे लफ़्ज़ों से पहले मेरी खामोशी को समझे,
तो क्या बात हो।।
दीवाने तो बहुत हैं यहां उसके मगर वो खुद को सिर्फ मेरा दीवाना समझे
तो क्या बात हो।।
मंजिल का तो पता नहीं मेरे दोस्त वो बस खुद को मेरा ठिकाना समझे
तो क्या बात हो।।
मिलने को तो बहुत हैं मिले मगर वो सिर्फ खुद को मेरा सहारा समझे
तो क्या बात हो ।।
इन सारे किस्सों से पहले वो उन धुंधले जज़्बातों को समझे
तो क्या बात हो ।।
हक़ है मेरा उसपर बराबर ये वक्त गुजरने से पहले कह दे
तो क्या बात हो।।
वो कल की अनचाहे दूरियों से पहले मेरी आज कि हकीकत को समझे
तो क्या बात हो।।
ये सिर्फ मेरे जज़्बातों का कहर है ख़ुदा बस इतनी सी महर कर दे
तो क्या बात हो।।
By Srishti Shrivastava

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