Dusro Ka Dukh (दूसरों का दुख )
By Alok Singh
कुछ समय पहले मै काफी दुखी था। मुझे लगता था की यह सब मेरी ज़िंदगी मे ही क्यूँ हो रहा है? किसी भी मित्र की सोशल मीडिया प्रोफाइल देखता तो लगता था सारी खुशी ईश्वर ने उन्हे ही दे दी हो। कोई तो होगा जिसके जीवन मे भी समस्याए होंगी। और इसी कारण अखबारों मे दुख की खबरे और शोक-संदेश मेरा पसंदीदा हिस्सा बन गए। ये पढ़कर मुझे अजीब सी शांति मिलती थी। कभी किसी का दुख ज्यादा नजर आता, तो थोड़ी प्रसन्नता भी होती। परंतु, क्यूंकि किसी शोक-संदेश पर खुश होना अच्छी बात नहीं होती, इसलिए मैं किसी के गम मे खुशी पाने की अपनी आदत को अपना दुर्भाग्य मान लेता और दूसरों का दुख पढ़कर खुश-गमगीन हो जाता।
दूसरों के दुख की खोज मे मै अखबार मे हर वर्ग के लोगों के बारे मे पढ़ता। इन सब मे एक तबगा ऐसा था जो मुझे फूँटी आँख न बाहता था। इस तबगे के लोग हमेशा अखबारों मे हस्ते नजर आते थे। ऐसा लगता था ईश्वर ने इन्हे इसलिए बनाया था, ताकि मेरे जैसे लोग शांति से दुख का आनंद भी न ले सके।
एक दिन मेरी किस्मत के दरवाजे खुल गए, अखबार खोलते ही मैंने कपूर खानदान की एक विख्यात अभिनेत्री का इंटरव्यू पढ़ा । इंटरव्यू का शीर्षक था,” जब मै गरीबी मे रो पड़ी”। अखबार मे अभिनेत्री ने बताया की एक समय उनका परिवार इतना गरीब हो गया था कि उन्हे बाहर जा कर पिज्जा (pizza ) खाने के लिए भी सोचना पड़ता था। ये सुनते ही मानो मेरे अंदर हर्ष की एक लहर उमड़ पड़ी। मैंने पास मे रखी शाम की रोटी को चाय मे डुबाया और फाटक से हजम कर लिया। पहेली बार किसी बड़े व्यक्ति का दुख बड़े स्तर पे जान कर मानो मेरे जिस्म मे अजब सी खुजली होने लगी। मेरी उँगलिया खुद ही बदन को खुजाने लगी। लग रहा था इस बार बनियान मे पाँचवा छेद कर ही देंगी। लेकिन मैं अभिनेत्री के दुख मे इतना मगन था कि इरादा कर लिया कि हो जाने दो बनियान मे एक और सुराग, मान लेंगे की वातानकुलित (AC) बनियान हैं। वैसे भी नंगपन तो आजकल फैशन है।
अखबार के फैशन के इस पन्ने को मैं न जाने कितनी बार पढ़ चुका था। ऐसा लग रहा था मुझे निर्वाण (nirvana), संस्कृति के इसी विकख्यात ग्रंथ से मिलेगा। मै बार-बार इस मोक्षदाता खबर को पढ़ता और मन ही मन खुश हो जाता। आस-पास बैठे लोग भी अब मुझे घूर-घूर कर ऐसे देख रहे थे जैसे मै पागल हूँ। शायद बुद्ध को भी प्रबोधन(enlightenment) से पहले लोगों की इसी तूछ सोच का सामना करना पड़ा होगा। मैंने अपनी विशालता दिखते हुए, उस खबर वाले पन्ने को अलग किया और बाकी का अखबार चाय की दुकान पे बैठे दूसरे लोगों को देने का प्रण कर लिया। लेकिन जैसे ही मै ये बलिदान देने वाला था, मेरी नजर मंगुराम पे गई। कम-बख़्त मुफ़्त का अखबार पड़ने के लिए चाय की दुकान पर आ जाता है। और बिना चाय खरीदे ही अखबार पढ़ लेता है। अरे ये भी कोई बात है, मै भी तो गरीबी सह रहा हूँ, लेकिन तब भी समाज के नियम निभाता हूँ। भले ही बिस्कुट के बदले अपने घर से बासी रोटी लाता हूँ, लेकिन कम से कम आधा कप चाय तो खरीदता हूँ। तभी तो मुझे इस चाय के ठेले पे अखबार पढ़ने का अधिकार मिला है। मुझे लगता है भारत की समस्या मंगुराम जैसे लोग ही हैं, जिन्हे फ्री का खाने की आदत हो गई है। समझते ही नहीं ये लोग सरकार का वृतीय (financial) दुख। अब कहाँ से मेक–इन-इंडिया (make –in – India ) सफल होगा जब इंडिया ऐसे लोगों को मेक करता हो। देश की उन्नति के लिए, मैंने अपनी मोक्ष प्राप्ति को थोड़ा विराम दिया और एक घंटे तक मंगुराम को अखबार से महरूम (bereft) रखा। जाते-जाते मैंने अखबार का हिस्सा चुपके के चाय वाले की दुकान मे छुपा दिया। और नौकरी की तलाश मे निकल गया।
ये दिन भी बाकी दिनों की तरह ही था। आज भी ढाई सौ की देहाड़ी (daily wage) ही मिली। फिर से आज धूप मे कपड़े पसीने मे धूल गए। लेकिन तब भी आज धूप की चुभन मे भी मुझे कांटे कम और फूल ज्यादा महसूस हो रहे थे। जब कोन्ट्रैकटर (contractor) ने शाम को ढाई सौ मे से केवल दो सौ बीस रुपए ही दिए, मै फिर भी उससे लड़ा नहीं और उसे दस रुपए और देकर बोला,” जा पिज्जा खा लेना”। समस्याए सब पुरानी ही थी लेकिन आज मुझे वो परेशान नहीं कर पा रही थी। अभी ज्ञान का भंडार पढ़े मुझे आधा दिन भी नहीं हुआ था और मुझे अभी से ही मोह-माया के भ्रम से मुक्ति मिलने लगी थी। इसी ज्ञान को और बढ़ाने के लिए मैंने निर्णय लिया की जो पढ़ा है उस पर अमल करूंगा। इसी के चलते मैंने शाम को अपने जमा पैसों को निकाल कर पिज्जा खाने का निर्णय कर लिया।
जिस तरह मंदिर जाने से पहले नाहते और तैयार होते है। उसी प्रकार मै दो बार अच्छे साबुन से नहाया, तीन रुपए का डव (dove) शैम्पू भी लगाया। जूते पॅालिश कर और अपनी एकमात्र सही सलामत शर्ट-पैन्ट को पहनकर मै अपनी कर्मभूमि जाने को तैयार हो गया। क्यूंकि बड़े काम की शुरुआत बड़ी होनी चाहिए, इसलिए मैंने साइकिल छोड़कर ऑटो से जाने का फैसला लिया। जैसे ही मैं पिज्जा की दुकान के सामने पहुँचा तो बड़ा सा कांच का दरवाजा देखकर मुझे कुछ हिचकिचाहट हुई। मैं पहली बार ऐसी दुकान पे आया था। एक लंबी सांस लेकर मैं अंदर गया तो नज़ारा मेरी कल्पना के परे था। मुझे लगा पिज्जा खाने चटक-भटक कपड़ों मे बड़े लोग आए होंगे। लेकिन यहाँ तो युवक- युवती चडडो मे घूम रहे थे। पहले समझ मे कुछ नहीं आया। फिर मेरे दिमाग की घंटी जली। शायद ये सब भी मेरी तरह ही उस खबर को पढ़ के पिज्जा खाने आए होंगे। लेकिन ये इतने गरीब हैं कि न बाल बनवाने के पैसे थे और न ही पूरी पैन्ट खरीदने के। ईसलिए शायद चडडो मे ही पिज्जा खाने आ गए। मुझमे आत्मविश्वास की नई लहर जाग गई। मैं यूनिफॉर्म मे खड़ी दुकानदार के पास गया, मैं कुछ बोल पाता इससे पहले ही वो मधुर शब्दों मे बोली,”वेलकम सर, आप क्या लेना पसंद करेंगे?” आज तक मैं अपने शिक्षकों को ही सर कहता आया था। ज़िंदगी मे पहेली बार किसी ने मुझे इतने प्यार से सर बोला था। मेरे अंदर का बचा-कूचा संशय (doubt) भी विलुप्त (vanished) हो गया। मुझे विश्वास हो गया था की मै सही राह पर हूँ। अभी मुझे पूर्ण ज्ञान मिला भी नहीं था और अभी से ही लोग मुझे अपना गुरु मानने लगे थे। ज्ञान के लिए धन का ध्यान न देते हुए मैंने कई पिज्जा ऑर्डर कर दिए। पिज्जा के स्वाद का मैं बखान नहीं करूंगा, शायद रोटी थोड़ी और पकी होती और थोड़ा घी उसमे और लगा होता तो शायद जायद बेहतर होता। मुझे सूखा पिज्जा खाने मे भी दिक्कत तो हुई लेकिन फिर मेरे खुले ज्ञान चक्षुओ (mind’s eyes) ने मुझे समझाया की अमीरों के अमीर बनने की कड़ी राह मे सूखा पिज्जा खाना भी उनके बलिदान का एक का भाग है। इसके अलावा खाते वक्त मेरे दिमाग मे एक ही चीज़ चल रही थी कि जो वो विख्यात अभिनेत्री नहीं कर पाई अपनी गरीबी मे, मैं अपनी गरीबी मे कर पा रहा हूँ। मैं इतना गरीब नहीं जितना खुद को सोचता हूँ।
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अपने ज्ञान का प्रैक्टिकल (practical) करने के बाद तीन-चार दिन तक मैं अध्यात्म के दूसरे चरण पर तैरता रहा। मैं मोक्ष प्राप्ति की और आगे बढ़ने ही वाला था की मुझे मानवीय दुनिया ने ज़मीन पर खेंच लिया। अब मै दो हफ्ते से चाय नहीं पी पा रहा हूँ। चुपके से जाता हूँ और नजर छुपा के अखबार पढ़कर आ जाता हूँ। एक दिन मै अखबार पढ़ने गया , तो मंगुराम के एक हाथ अखबार और दूसरे हाथ मे चाय देखी। बड़े संयम से अखबार पढ़ रहा था , और बीच-बीच मे चाय की और भी देख लेता था। चाय कबकी ठंडी हो गई थी, पर मंगुराम ने अभी तक आधा ग्लास भी नहीं पिया था। मै इंतज़ार कर रहा था की कब वो चाय पीए और मै अखबार पढ़ संकू। अगर मेरे पास चाय के पैसे होते तो अभी तक मंगु से अखबार छीन चुका होता। मंगु को मेरी उपस्थिति का आभास हो गया था। इसीलिए पिछले 15 मिनट से एक ही पन्ने पे था। फिर थोड़ा सा अखबार नीचे करके बोला, “कैसे लोग हो गए हैं कम-बख़्त मुफ़्त का अखबार पड़ने के लिए चाय की दुकान पे आ जाते हैं। ऐसे थोड़े न मेक इन इंडिया सफल होगा, जब ऐसे लोग इंडिया मेक करेगा”। और फिर अखबार उठा के पढ़ने लगा। इतनी बेज्जती के बाद मेरे अंदर थोड़ी बेशर्मी की ताकत जगी और मै मंगु के पीछे खड़े हो कर अखबार पढ़ने लगा। अपनी पसंद की खबरों को ढूंढते हुए मेरी नजर को एक खबर ने रोक लिया, लिखा था ,” कैसे गरीबी मे पास्ता (pasta) भी नहीं खा पाती थी ये अभिनेत्री”। मेरे चेहरे पे हर्ष की एक लहर आ गई, और सोचा कोई नहीं प्रबोधन (enlightenment) के लिए दो महीने की चाय फिर कुर्बान सही। आखिरकार मोक्ष की राह दूसरों के दुख को समझने से ही गुज़रती है। *****************************
By Alok Singh

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