Do Saza Do !
Updated: Jul 15, 2025
By Niharika Chhabi
दो सज़ा दो घोर को ऐसे आदमखोर को !
कैसे हम सब सो गए जब चील कौवे रो गए
बहन-बेटी के चिथरे उड़ाए जिस्म के,
रूह को भी तोड़ डाला था किसी के पाप ने,
चहक थी -वो फूल सी ,मांगी हुई थी वो एक दुआ
प्रश्न है समाज आखिर उसके साथ ये क्यू हुआ?
हम मरीजो के मर्ज को ठीक करना था उसे
हाय क्या थी नेक नेमत ,हाय क्या उसको पता ,
इस सिफ़ा और सिद्दीका का अब करो तुम फैसला
आदमी के भेस में था कौन सा ये दैत्य वो?
हमने पढ़ा था ;बंदरों से साल कुछ हज़ार में ...
बन गए हम मानव जामे,सकल ,नकाब से
पर बंदरों के झूँड ने न किया ऐसा हसर
रूह जीसे काँप उठे, सारे रोम थर्रा ऊठें...
शर्म और क्रोध भर इंसान हम भी हैं इधर
कोपलों को रौंदकर और फूल सारे नाश कर
आदमी था बन पड़ा मोर्डेन मोबाइल तान कर!
धिक्कार है !उस मौन का कुछ तो गलत है समाज पर ,
वो कभी जो खुद में झांकना ना सीखा रहा ,
बस दौड़ते ही जा रहा बस दौड़ते ही जा रहा ,
कुछ सोच को अब तो बदल !!
कुछ आएने से पूछ लो ,
कुछ प्रश्न कर समाज से ,
कुछ ले जरा हिसाब भी,
कुछ तो मचाओ शोर अब !
कुछ तो दिखाओ जलजला
ये समाज है! जहां ये क्रूर पल रहा
और दरिंदों को भी हमारे क्रोध का पता चले
रुद्र का तांडव और कालिका का कोप भी पता चले !
जो दर्द दारुण दे दिया उसको सही सिला मिले
माफी नहीं इस जुर्म की !ये तो सजाये मौत है-
एक नादान का ,ईमान का, माँ- बाप के संतान का !
कोई टुकड़े उठाए रो रहा, कोई चादर चढाए सो रहा !
मत बना समाज आदमी ऐसा - सा तू
और ये ना कहना की कैसे है कटघरे में तू?
उस चीख को चीतकार का
उस रूह की पुकार का, बदला अगर ना ले सको तो बदला जरा सा तुम करो!
थोरा थोरा ,रुक बैठकर अपनी वासना और विषय पर सोचना सिखाया करो!
जीवन के मर्म पर और मानवता के धर्मा पर चलना सिखाया करो ,
चौखट को मारना नहीं, ठीक से चलना सिखाया करो...
आदमी दिखना नहीं ,बनना सिखाया करो!
स्त्री कोई वस्तु नहीं ,जागीर ना वो है तेरी!
जिसके जीवन के डोर मोड ,दो और जीत कर तुम तोड़ दो!
और हाँ पुरुष ही नहीं, स्त्री को भी स्त्री की वेदना सिखाया करो,
ताकि जब वो माँ बने तो दानव नहीं दैवत्व की प्रेरणा सिखाया करे !
जागो! हर अनर्थ अन्याय के विरूद्ध हो जाया करो
और भस्म कर दो राख़ को ,
उस आत्मा को मुक्त कर!
ए समय! तूह रुख बदल दे कलयुगी संताप का
अब नहीं सहा जाता धरती से बोझ पाप का !
आसमाँ भी चीखता क्यूँ दी मानव मर्ज़ी तुझे
कैसी ये दरिंदगी, कैसी खुदगरजी तेरी !
शक्ति हैं सारी देवियाँ बोलो फिर ये क्या हो रहा
कुछ तो करो प्रश्न अब ,क्यूँ हो रहा बर्बाद सब?
दो सज़ा दो घोर को !ऐसे आदमखोर को !
By Niharika Chhabi

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