Dear Didi
By Dhruv Pandey
Dear दीदी,
कैसी हो?
तुम यह सबसे पूछती हो,
दोस्तो से, परिवारों के सदस्यों से यहां तक कि अजनबियो से भी।
पर तुमने कभी खुदसे पूछा है क्या?
अगर मै तुमसे बोलू की जिनसे तुमको मोहब्बत है उनको हर्फ में उतारो,
तो तुम अपना भी नाम लिखोगी क्या?
अगर तुम कभी खुदसे रूबरू होगी,
तो क्या तुम उसे अपने आबरू का हिसाब बताओगी ,जो तुमने दुनिया के शर्तो पर कमाए थे?
क्या तुम ही सुनोगी उन ख्वाबों को तुमने जो कभी खुद से फरमाए थे?
Dear दीदी,
कुछ कहना है तुमसे
मुझे पता है तुम्हारे दिन बेहतर नही जा रहे।
कितना कुछ बदल गया बीते दिनों में।
तुम सबको अपनी फर्जी मुस्कानों से जताती हो की कितनी शांत हो।
पर तुम्हारे अंदर के बवंडर का शोर कोई सुन ही नही पा रहा।
कितने ख्वाब देखे थे तुमने पर कुछ हो ही नही पा रहा।
अब तो दुनिया भागती नज़र आती है,
और समय सिर्फ फिसलता।
काम अभी भी टालती हो या उसकी आदत छोड़ दी?
नीद आती है या अभी भी तुम fake scenario का सहारा ले रही हो?
मै ज्यादा कहता नही पर मुझको तुम पर नाज़ है।
तुम दिल खोल कर प्यार देती हो पर मेरी मानो तो थोड़ा अपने लिए भी बचा लेना।
जब लगे लोगो के आरोप सक सभी सही है,
तुम फिर भी खुद को चुनना।
जब तुम समाज की पाबंदियों से घुट कर बिखर जाओ
तो थोड़ा नम्रता से खुद को बीनना।
तुम जैसे "लोग क्या कहेंगे?" पर जितना ध्यान देती हो
उतना अब खुद पर देना।
साबुन के बुलबुले वाले पानी में कुछ देर और रहना।
अपना मन पसंद गाना लगा कर बेशुद होकर झूमना
मोमबत्ती जला कर आईने में खुद को चूमना ।
तुम अबला नहीं, अप्सरा नही,
तुम बारिश की वो प्रबल बूद हो जो लाखो मील
से गिरती है,
और गिरते गिरते एक जीवन बसा देती है।
तुम वो मोती हो जो गोताखोरों की जिंदगी सवार देती है।
तुम वो सुनहरा सवेरा हो जो आशा की किरण लाती है
और तुम वो काली रात हो जो हर एक नीद मुकमल करती है।
निराश, उदास, हताश होकर तुम भी बैठी हो दुनिया और उसके लोगो से?
पर यह सुनो,
उठो चलो गिरो पड़ो इतना बड़े बनो की इस मासूमियत से रंगी ज़माने के खूनी हाथ तुमको नोच न पाए।
इतने कामियाब बनो की जो ताने देते थे वो कुछ सोच न पाए।
छीनकर, मांगकर, रोकर कभी भी प्यार न मांगना.
दूसरो की जरूरत न पड़े
खुद को इस कदर पूरा रखना।
जीते जी मारो नहीं।
रोना आता है तो चीख चीख कर रोओ।
और याद आती है तब मुझे कभी भी फोन करो ।
तुम्हारे अंदर का हर दर्द और डर मिटाना चाहता हूं।
Dear दीदी तुमको में खुश देखना चाहता हूं।
By Dhruv Pandey

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