Dark Shadow
By Jagruti Parish Jadhav
दो सुनी आँखे एकटक आसमान की और देख रही । वह शाम का समय था। वो एक मैदान सा था। उसमे हर उम्र के लोग थे। कुछ मोबाइल मे लगे थे, कुछ खेल रहे थे, कुछ चहल पहल कर रहे थे। पर वो सुनी आँखे एकाएक आसमान की और देख रही थी। मानो वो किसीको तलाश कर रही। इस चलती राह मे भटकी हुई वह और आसपास लोगो का ढेर । उन आँखो मे भारी सूनापन था। वो करीब सत्तर साल की उम्रदराज मे थे। कबीराचंद सराफ नाम था उनका। जब उनकी आँखो से यूही पानी निकल रहा था, तो वो पोछ भी नही रहे थे।
पास खडी एक लडकी ने, एक लडके के कान मे कहा - यार ये अंकल कौन है? रोज इसी टाइम आ जाते है। आज तो हम देखकर ही जाएंगे।
लडका - जाने दे ना, होगा कुछ हमे क्या। कहकर वो उस लडकी का हाथ पकड वहा से चला गया।
ओफ्फो कितना रोता है तूम....
लो आज भी वही शर्ट...
छी, देखो बुढ्ढो हो गया है तूम...
मेरे जैसा यंग लगना होना तुम....
उस सुनी आँखो मे यूही चमक आ गयी। वो इस आवाज का तरफ देखनी लगे, जब उनकी नजर साइड मे गयी तो वहा एक लेडी बैठी थी, जो उनसे बात कर रही थी। नदारद उनका काँपता हुआ हाथ आगे बढा, और सामने वह थी, "उनकी रोजी"
क्या मैन तुमसे बात करता है मै, वह उम्र मे लगभग साठ साल की थी।
जाओ मै तुमसे बात नही करता, पता है ना कितनी दुर से आता है मे...
कबीराचंद जी की उम्र ज्यादा होने से, उनके हाथ काँप रहे थे, पर वैसेही उन्होने अपनी रोजी का हाथ पकडा, और हल्केसे रोजी के गाल खिचने लगे।
कबीरा, तूम न बहुत नौटी हो गया है। और वह बस रोजी का हाथ पकड कर बैठे थे, जैसे कोई छुडा रहा हो।
दो आदमी हाँफते हुए यहा वहा देख रहे थे।
"अरे यार अब क्या होगा, वो बुढाऊ तो मिल ही नही रहा", एक गार्ड ने दुसरे गार्ड से कहा।
दुसरा गार्ड कलपते हुए - तूझे पता है ना वह चाचा बस यहा से खिसकने की राह देखते है, फिर भी इतनी लापरवाही, आज तुम्हारा पाँचवाँ दिन है और अभिसे लापरवाही "
पहला गार्ड - अरे भाई नेचर कॉल समझा कर।
दुसरा गार्ड - अगर डॉ बित्रा को पता लगा ना तो फिर से डाट पडेगी।
दुसरा गार्ड सीनियर था थोडा। तबतक डॉ बित्रा आ गए बाहर दोनो गार्ड सकपका गए।
डॉ बित्रा ने उनके हावभाव देखते हुए कहा - क्या हुआ इतने हडबडाये क्यो हो दोनों, रामपाल (दुसरा गार्ड) तुम बताओ।
रामपाल - वो सर.... वो पेशंट 32
"फिरसे, इससे पहले रामपाल कुछ कहता डॉ कह पडे।
रामपाल ने सर झुका कर हा कहा।
डॉ बित्रा - तुमने गार्डन मे देखा।
रामपाल ने हडबडाते हुए नही कहा।
डॉ रामपाल को घूर कर गार्डन की तरफ चले गए।
पहला गार्ड जो की नया था, वह रामपाल से - क्या माजरा है भाई आखिर इस बुभाऊ का।
रामपाल - साथ मे चल खुद पता लग जाएगा।
कबीराचंद रोजी से बाते कर रहे थे और हाथ पकड कर बैठे थे। हल्का सा अंधेरा हो गया था, लोग थोडे कम हो गए थे। जब डॉ वहा पहुचे तब देखा रोज के अनुसार कबीराचंद जी अकेले बैठे थे, बैंचपर और अकेले बडबडा रहे थे। डॉ कबीरा जी के पास गये, और उनका हाथ पकडने लगे, लेकिन वो बस दुर जा रहे थे, धीरे धीरे डरकर और रोजी को छुपा रहे थे, जो सिर्फ उन्हें दिखती है। वो पैनिक हो रहे थे।
डॉ धीरे धीरे आगे आए उन्होने इंजेक्शन तयार किया और धीरे धीरे बढकर कबीरा जी को वो लगा दिया। अब कबीरा जी बिलकुल पहले की तरह शांत थे, उनकी सुनी आँखे फिर से खामोश हो गयी।
पहला गार्ड रामपाल की तरफ देख रहा था।
रामपाल ने कहना शूरु किया,
लगभग पाँच साल पहले यह चाचा यहा आये थे, रोजी इनकी बीवी का नाम था, पर उनकी बीवी चल बसी। उन्है कैंसर था, और ये उन दोनों की फेवरेट प्लैस हुआ करती थी।
पहला गार्ड - तो इनके बच्चे
रामपाल - नही थे। इनके पडोस मे रहने वाले लोगो ने यह जानकारी दी, तबसे चच्चा अपना आपा खो बैठे है, और समय मिलने पर भाग जाते है।
कबीरा जी की आँखे शून्य मे चली गई। वह लगभग बेहोश हो चुके थे, तब तीनो मिलकर उन्हे एक बिल्डींग के अंदर ले गए, जिसपर नाम लिखा था "द लॉस्ट असायलम"
समाप्त -
By Jagruti Parish Jadhav

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