Chand Sikke
By Anurag Nigam
सिक्कों से जिन्दगी की गुल्लक भर रखी है मैंने,
बाजार लगा अगर तो खुशियाँ खरीदने निकलूँगा...
सब भूल के इक बच्चे सा रखा है दिल अपना
टूटा बिखरा कई बार, गम नहीं
अब सिक्कों से बचपन खरीदने निकलूँगा...
वो कागज की नाव और बारिश का पानी
पेड़ की छाँव और परियों की कहानी,
और वो नीर की मिठास खरीदने निकलूँगा
अब सिक्कों से बचपन खरीदने निकलूँगा...
बेफिकरा सा मन, न डर किसी दौर का
न जीवन की चिन्ता, न भय रहे मौत का,
अब बस उस समय की आस खरीदने निकलूँगा
अब सिक्कों से बचपन खरीदने निकलूँगा…||
By Anurag Nigam

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