Beshart Ishq
By Anurag Nigam
मैं उसे कुछ न पूंछूं तब भी वो मुझे सब बताती है
इश्क है उसे कितना मुझसे वो मुझे बिना शर्त समझाती है
तमाम तकलीफों की बंदिश से बंधा रहता हूं अक्सर मैं
वो सर पे हाथ रखके बिलकुल मां जैसा सहलाती है
मुक्कमल कहां जहां में मोहब्बत आशिकों की
सारे रीति रिवाजों से परे वो मुझपे बेपनाह प्यार लुटाती है
इश्क, हां जी बेशक इश्क ही है उसे हमसे
विश्वास खुदा से ज्यादा, मुझपे हक खुद का जताती है
कैसे कह दूं की बस ,अब बस, अब और कुछ नहीं
वो अपना हर त्योहार मुझे ही बताती है ....
मैं उसे कुछ न पूंछूं तब भी वो मुझे सब बताती है ....
By Anurag Nigam

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