Bejubaan Nikalte Hain
Updated: Jul 15, 2025
By Gyan Prakash
बंजर जमीं से भी कभी कुछ अरमाँ निकलते हैं
वो गए हमारी दुनिया से जैसे मेहमाँ निकलते हैं
कोशिशें तो बहुत की खुद को पत्थर बना लेने की
अश्क़ निकल ही जाते हैं जब यादों के कारवाँ निकलते हैं
हर शाम मैखाने में गुज़ारी, उन्हें भूल जाने को
पागल थे ना समझ सके दिल से लोग कहाँ निकलते हैं
होश औ बेखुदी का फ़र्क़ खो सा गया कहीं ना कहीं
पडोसी बताते हैं घर से हम कुछ परेशाँ निकलते हैं
डर सा लगता है हाल-ए-दिल सुनाने में किसी को
महफिलें सजती हैं जहाँ, वहाँ से हम बेजुबाँ निकलते हैं
By Gyan Prakash

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