Barbaad Kar Mere Rishte
- Hashtag Kalakar
- Dec 19, 2025
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By Kshitij Kawatra
बर्बाद कर मेरे सभी रिश्ते यहाँ
कब रोकने से है रुकी सैफ़-ए-ज़बाँ
मत पूछ तू क्या इश्क़ में हासिल हुआ
मैं मावरा था आलम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ
है ढूँढती फिरती मुझे दुनिया कहीं
मैं छुप गया जैसे ख़ुदा का हूँ निशाँ
तय कर चुका मैं मंज़िलें जो दूर की
क्या फ़िक्र फ़स्ल-ए-गुल मिले या फिर ख़िज़ाँ
था काम ग़ैरत तेरा मुझ को रोकना
क्यों संग मेरे चल पड़ी ओ राएगाँ
क्या फ़िक्र उनको जो हुए अहल-ए-चमन
गुलज़ार की चिंता में डूबा बाग़बाँ
मैं ढूंढता था जब मदद मेरे ख़ुदा
तू ने वफ़ा की शर्त रख तोड़ा गुमाँ
By Kshitij Kawatra

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