Badhta jata ek or kadam
By Bhagat singh
मंजिल की तरफ
या दूर सही
कभी नरमी
कभी गुरूर सही
रूई उड़ती
सर्द बर्फ हो
या आँधी उड़ती
रेत गर्म हो
चलना तो है
चलते जाना है
बुनना एक ताना-बाना है
एक टूटे तो
दूजे को पाने की खातिर
बढ़ता जाता
एक और कदम*
सीधी राहे
सीधी राहे
टेढ़ी होती
सीधी राहे
पर चलना है
चलते रहना है
शंख मिले
या सींप मिले
तम मिले गहन
या दीप मिले
बीहड़ में भी
दिशा खोजता
मंजिल की तरफ
बढ़ता जाता
एक और कदम
और सही
बस और सही
चंद कदमों का
रस्ता और सही
रूकने से भी
मिलना क्या है
थकने से भी
मिलना क्या है
हिय में अनल
हथ में लगन
ले,चल जाता
पाते जाता
मेहनत की तरफ
बढ़ता जाता
एक और कदम
हाथ उठाए
शमाँ जलाएँ
शीश उठाए
और जगाए
अटल इच्छा
अरमा सच्चा
है थोड़ा भय
मन में संशय
पीछे देखा
अब आगे क्या
पीछे तो हुआ
पर आगे आता
आस लगा
बढ़ता जाता
एक और कदम
इसे देख कर
उसे देख कर
क्यों है ताकता
क्यों है झाँकता
कमतर क्यों खुद
को है आँकता
अपनी हवा
सब खींचते
अपने स्वपन
सब सींचते
फिर बिन भटके
खुद के ही किए
तय रस्ते पर
बढ़ता जाता
एक और कदम
स्वपन में
सच्चाई कितनी
ये स्वपन
थोड़ी तय करेगा
आनी-जानी कब है
लहरें समंदर
तय करेगा
लहरें दिमागी
शांत कर
नए इरादे
में दम भर
जीते आए है
जीते जाएंगे हरदम
बढ़ता जाता
एक और कदम॥
By Bhagat singh

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