Agnipath
By Ram Kripal Singh
अग्निपथ
सतयुग, त्रेता, द्वापर बदले,
कलयुग का क्रम चल रहा अभी।
सदियाँ बीती और युग बदले,
बदले मानव के रीति सभी।।
राम, कृष्ण, गौतम बदले,
रूप बदली शिक्षा, दीक्षा की।
बदली न केवल एक रीति,
सीता की अग्निपरीक्षा की।।
गर हार मान लेती सीता,
कहीं दुष्ट दसानन के डर से।
क्या कर सकती वानर सेना,
स्वयं राम लखन, अपने शर से।।
हर युग में पुरुष ही नारी पर,
अन्याय सदा करता आया।
अग्निपरीक्षा से गुजरी,
फिर भी सीता ने क्या पाया।।
इस अग्निपथ पर है चलती,
केवल बस केवल क्यों नारी।
क्या, धोती में दाग नहीं लगती,
जलती है केवल क्यों साड़ी ??
नारी की रूप है ये सीता,
सर्व शक्तिमान दुर्गा, काली।
वैभव, विवेक की ये देवी,
फिर भी क्यों है, खाली खाली।।
हर युग, हर पल पुरुषों ने,
शोषण है किया नारी का।
पाषाण अहिल्या बन बैठी,
सौनेत्र इन्द्र व्यबिचारी का।।
नारी का हीं सम्बल पा कर,
नर पाता अपना लक्ष्य सदा।
उस भरी सभा में चीरहरण,
क्यों मौन थे अर्जुन, भीम गदा।।
क्या कोई पति जला होगा,
अपने पत्नी के शव संग ?
लक्ष लक्ष केवल नारी,
कर दी है भस्म सब अंग अंग।।
रचती है सृष्टि को नारी ही,
असीम वेदना सह कर।
सम्बोधन संताने करती हैं,
नाम जनक का कह कर।।
पुत्री, पत्नी, जननी बन कर,
ये त्याग, दया दर्शाती है।
पुरुषों की पगड़ी पर ऊँची,
ये दो नंबर पर आती हैं।।
पुरुषों के अपावन, क्रूर कर्म,
अपलक मूक रहती सहती।
पापों को धोती ये नारी,
गंगा बन कर बहती रहती।।
नारी का स्वाभिमान जगा है,
ना छेड़ो इसकी गरिमा को।
पुरुष पाखंडी सम्भलो तुम,
ना पार करो सीमा को।।
याचना नहीं स्वयं ले लेंगी,
अधिकार ये अपने बल पर।
करना होगा सिद्ध तुम्हें भी,
इस अग्निपथ पर संग चल कर।।
By Ram Kripal Singh

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