AAFTAAB
By Arun Badgal
कुछ और दिखा ही ना उसके सिवा
जब से वो एक आफ़ताब देखा है
दिन में सो रहे हैं रातों को जग रहे हैं
इल्म नहीं कि ख़्वाब में हकीक़त
या फिर हकीक़त में ख्वाब देखा है
दो आँखें देखीं हैं आँखों में शबाब देखा है
सुना है नैन-ओ-नक्स भी बड़े तेज़ हैं उनके
हमने तो जब भी देखा है चेहरे पर नक़ाब देखा है
किताबों में अक्सर रखा हुआ गुलाब देखा है
यह पहली दफ़ा है कि
गुलाब को हाथ में लिए किताब देखा है
मुसल्सल सा हो गया अब तो देखना उनको
लेकिन दिल की बेबसी का आलम तो पूछो
उनको निगाहें छुपाते जो जनाब देखा है
दूर से तो हमने उनको बेहिसाब देखा है
एक दिन देखा जो पास जा के
जैसे क़िब्ले का कोई मेहराब देखा है
पूछ ही लिया हिम्मत जुटा के
कि हमने तो तुमको देखा है ऐसे
जैसे आंखें बंद करके कोई शिहाब देखा है
लेकिन आपने हम में ऐसा भी क्या खराब देखा है
जो आज तक कभी ना हमारा
सर झुका के किया हुआ आदाब देखा है
ख़ामोश खड़ा रहा वो बोला कुछ ना
लेकिन उसकी चुप्पी में मैंने जवाब देखा है
जो चमकती थी शब्-ताब की तरह
उन आँखों में ख़ौफ़ का सैलाब देखा है
जैसे ही हटाया महताब से पर्दा उसने
एक रुख पर गिरा हुआ तेज़ाब देखा है
पत्थर सुन्न हो गया वहीँ पर
खुदा के हुस्न को मिला दुनिया का खिताब देखा है
वो दिन गया सौ दिन गए
ना वो आँखें देखीं हैं ना ही वो नक़ाब देखा है
लेकिन उसके सिवा अब देखा ही कुछ ना
जब से वो एक झुलसा हुआ आफताब देखा है
जब से वो एक झुलसा हुआ आफताब देखा है
# आफताब = Sun
# मुसल्सल = Continous
# शिहाब = Burning Star
# शब्-ताब = Fire Fly
# महताब = Moon Light
By Arun Badgal

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