Aadha Ishq
By Karan Kaushik
जो रूठा ही नहीं उसे मनाऊँ कैसे
जिसने अपना समझा ही नहीं
उसे समझाऊँ कैसे
वो तो बस एक खेल खेल रहे थे
जिसका हम एक हिस्सा था
वो हमारे लिए ज़रूरी बन गये थे
उनके लिये तो हम सिर्फ़ एक पल का क़िस्सा थे
हम हक़ीक़त ढूँढ रहे थे जिनमें ज़िंदगी की
शायद उनके ख़्वाबों में भी हम एक झूठा हिस्सा थे
पर उनके इस छल को हम समझ भी कैसे पाते
कम्भक्त प्यार उनका असली है
बिना प्यार किए वो है ऐसे जताते
फ़िक्र तो मानो उन्हें सबसे ज़्यादा हो
जो तोड़ा ना हो उन्होंने शायद ही ऐसा कोई वादा हो
चलो वादों के लिये तो फिर भी उन्हें माफ़ किया
पर उस भरोसे का क्या जो उन्होंने हमे कराया था
जब डरते थे हम रिश्तों से तब उन्होंने विश्वास दिलाया था
वो भरोसा और विश्वास क्या हम दोबारा कर पाएँगे
जो उनके झूट में कहीं खो गया
हम अपना वो सच कहाँ से दोबारा लायेंगे।
By Karan Kaushik

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