हसरत
By Vikas Kumar
एक हीं हसरत है,
तुम पास आ जाओ।
इस दिल में बस जाओ।
तेरे गोद में दो पल बिताए।
तेरे सांसों में हम खो हीं जाएं।
फ़िर मंजिल की ओर कदम बढ़ाए।
गुरुर ए आशिकी लूं।
शऊर ए मौसिकी लूं।
लबों से शबनम उधार लूं।
ये जिंदगी मैं तुझ पे वार दूं।
साझे सपनों को साकार दूं।
ये चांद भी जमीं पर उतार दूं।
एक हीं वहशत है,
इतने करीब फ़िर जा भी सकेंगे?
वो पल फ़िर कभी आ भी सकेंगे?
तेरे संग ये जिंदगी गुज़ार भी सकेंगे?
मुस्तक़बिल में तुझे उतार भी सकेंगे?
साझे सपनों को कभी साकार भी सकेंगे?
गर हाथों में तेरी मेरी हाथें हो,
रास्ते हो जाएंगी और भी हसीन।
गर तुम बन जाओ मेरे हमसफ़र,
मंजिलों से हसीन फ़िर होगी सफर।
अंज़ाम ए सफ़र से होके फिर बेफिक्र,
मंज़िल खुद हो जायेगी फिर मुकम्मल।
By Vikas Kumar

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