सरगम
Updated: Feb 14, 2024
By Srishti Gupta
दो चार पहर जब हो जाए
जब साज़ो की सरगम खो जाए
जब कोई अंतरा ताल कहे,
मालकौस, गुरजरी के संग
जब कोई राग अड़ाना हो जाए
तुम समझ तो लोगे न हमको ?
जब गुस्से से गुज़ारा हो जाए
कहने को बातें हैं मीठी
तानपुरा के रंगों में
कभी कजरी कहो तो बात बने
बातें होती बस छंदों की
इस फलसफे की हमजोली में
चल गुस्से से किनारा हो जाए
राग.. यमक की बातों पर
लयों की चलन की बातों पर..
आरोह पकड़ सा जाता है
जब गुस्सा भीतर हो अपने
तब कोई राग समझ कहां आता है!?
तो सांसों की सरगम खो जाएं ,
इससे पहले कुछ हो जाए
चल गुस्से को अब छोड़ ज़रा
एक सरगम को जोड़ ज़रा
यूं राग जुड़े मल्हार बने
चल गीतों की गठरी खोल ज़रा
खामोशी की सरगोशी को
अब कितनी बारी दोहराया जाए
यूं बीत गया इतना अरसा
चल तो अब नया बनाया जाए!
By Srishti Gupta

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