सरगम
By Vikas Kumar
बस कुछ सपनों से जागा हूं,
फिर उन ख्वाबों में खोया हूं।
एक दरीया है कुछ यादों की,
उन लम्हों में डूब के आया हूं।
एक आश सी दिल में जलती है,
हर पल दिल को सुलगाती है।
इस दिल के दरवाजे पर तुम,
क्या फ़िर से कभी दस्तक दोगी?
इस दस्तक की हीं आश में बस,
धड़कन ये धड़कती जाती है।
ये आश की लौ भी जालिम है,
तूफानों में भी जलती हीं जाती है।
आश की लौ में है, जीवन का सरगम।
इन तूफानो में है, बस मौत का मातम।
जीत क्या सरगम की होगी?
या मातम हीं सरगम होगी?
क्या इन तूफानों से डरकर,
हम गाना भूल हीं जाएंगे?
या इस आश की लौ में हम मिलकर,
कुछ अच्छे राग, संगीत को दे जाएंगे।
By Vikas Kumar

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