समाज
By Vishvadeep Jain
एक सवाल हैं यार,
शायद थोड़ा अलग सा हैं,
पर पूछना जरूरी हैं,
सवाल मेरा सबसे हैं,
की क्या समाज की सुनना जरूरी हैं,
मेरे सपने जब मैंने खुद चुने हैं
तो क्या उनको समाज की राय सुनकर बदल लेना क्या वाजिब हैं,
जो साथी या दोस्त जिसको मैंने चुना हैं,
जिसके साथ रहना मुझको हैं,
जिसके साथ चलना मुझको हैं,
क्या उसके बारे मैं किसी और से सुनना क्या ज़रूरी हैं,
मुझे क्या करना हैं ये मुझे खयाल हैं,
क्या उस खयाल को समाज के डर से बदल लेना क्या वाजिब हैं,
सवाल ज़रा कठोर होगा,
पर ये सवाल मेरा उन घरवालों से हैं,
खुशी अपने बच्चे की आपकी कितनी प्यारी हैं,
समाज से ज्यादा या अपने बच्चे की जान ज्यादा प्यारी
हैं,
एक बच्चा क्यूँ समाज को खुश करे,
जब उसे खुशी सिर्फ आपकी और अपनों की मुस्कान प्यारी हैं,
वो लड़ रहा हैं सपनों से,
तो उन सपनो को समाज के मुताबिक क्यूँ ढालना हैं,
क्यूँ समाज को उपर और अपने खून को दबाकर रखना हैं,
क्यूँ साथ नहीं उसके सपने मैं और उसकी अपनी पसंद मैं देना हैं,
हा माना हर पल बच्चे भी सही नहीं होते,
फिर भी क्यूँ उस समाज की सुननी हैं,
जिससे ना कोई रिश्ता ना कोई नाता हैं,
वो समाज जो सिर्फ भीड़ का एक हिस्सा हैं,
जिसे ना फर्क़ पड़ता आपकी खुशी से,
वो दबाना शायद हर पल आपकों चाहता हैं,
कहना तो नहीं चाहता,
पर हाँ दबाव मैं हम आते हैं,
कई बच्चों के सपने बर्बाद हम कर जाते हैं,
जहाँ शायद अपनों को चुनना होता हैं,
हम कहीं समाज मैं खो जाते हैं,
और कई उज्जवल भविष्य को हम सूली चढ़ा जाते हैं,
कई तो खुद ही मौत के घाट उतर जाते,
कई हर रोज घुट घुट कर मौत के करीब पहुंच जाते हैं,
जब हम अपने से ज्यादा उस पराये समाज को गले लगाते है ,
चाहता हूं ये की समाज सशक्त हो,
पर किसी पर उंगली ना उठाए,
साथ दे हर सपने का,
पर किसी पर कीचड़ ना उछाले
मिसाल बने आने वाली पीढ़ी के लिए,
ना की फ़ालतू लोग बन कर रह जाये,
और समाज बस सामाजिक रहें,
ना की किसी के दुखों का कारण बन जाये
मैं चाहता हूँ कि सही गलत हर बार सही गलत की नजर से ना देखा जाये
बस एक छोटा सा सवाल मेरा कहीं दूर शायद सबको किसी दिन समझ आये ।।
By Vishvadeep Jain

Words are nicely portrayed 👍👏
💯💯
True words...