सपने…
Updated: Oct 1, 2024
By Rashmi Dadhich
पल दो पल की खबर नहीं,
मैं फिर भी बाग सजाती हूं।
नन्हीं नन्हीं कोपल को,
धरती पर रोज लगाती हूं।
क्या इस पल में, क्या उस पल में?
क्या छिपा है जीवन के जल में?
मैं सींच सींच कर जीवन को,
पौधों में फूल लगाती हूं।
पल दो पल की खबर नहीं,
मैं फिर भी बाग सजाती हूं।
तूफान बहुत से आते हैं,
फूलों को तोड़ ले जाते हैं,
पर कलियां अब भी ठहरी हैं,
फिर फूल बने लहराते हैं।
बीते लम्हों से सीख लिए,
मैं फिर से बीज लगाती हूं,
पल दो पल की खबर नहीं,
मैं फिर भी बाग सजाती हूं।
यह सपने ही तो जीवन है,
सृष्टि की रचना करते हैं,
सच करने को हर एक सपना,
पल - पल हम जीते- मरते हैं।
मैं हार को अपनी जीत बना,
फिर से उम्मीद जगाती हूं।
पल दो पल की खबर नहीं,
मैं फिर भी बाग सजाती हूं…
By Rashmi Dadhich

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