वजूद
Updated: Jul 17, 2025
By Dr. Imran A.K. Surti
वजूद इंसान का क्या रहा इस शहेर में,
बन गया है जंगल इमारतोंका इस शहेर में!
"वो" केहते हैं तरक्की का दौर है इस शहेर में,
फिर क्यों हैं लोग ख़ौफ़ज़दा इस शहेर में!
हड्डियों के ढांचे में रह गई है इंसानकी हस्ती,
जीना और मरना फ़िज़ूल हो गया इस शहेर में!
परछाइयों का मेला लगा रहेता है हर वक़्त,
मुश्किल से आदमी दिखाई देता है इस शहेर में!
बड़े एहतराम से जिन उसूलों को जिया था मैंने,
एक-एक करके उन्हें बेचा किया इस शहेर में!
हर इंसानी रिश्ता बन गया है तिजारत का सामान,
इत्तेफ़ाक़ और इत्तेहाद दुश्वार हो गया इस शहेर में!
By Dr. Imran A.K. Surti

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