बचपन !
By Abhay Raj Chand
मां की गोद और आंचल की छांव हुआ करती थी,
इंतजार करते थे बारिश का, तब कागज की नाव हुआ करती थी।
पापा के कंधों की सैर और मां का दुलार हुआ करता था,
जब भी पापा बाजार जाते, खूब इंतजार हुआ करता था।
कभी भाई-बहनों के साथ मिलकर, घर में कोहराम मचाया करते थे,
तब मम्मी पापा की डांट से, दादा-दादी ही बचाया करते थे।
कभी पापा की डांट से, तो कभी मां की पिटाई से डर लगता था,
तब सभी को सबसे अच्छा, नाना-नानी का घर लगता था।
तब सिर्फ ये बातें नहीं, दिलों का मेल हुआ करता था,
तब ये वीडियो गेम्स नहीं, छुपन-छुपाई का खेल हुआ करता था।
तब स्कूल तक भी मम्मी-पापा ही छोड़ आया करते थे,
अच्छे से पढ़ना किसी को परेशान मत करना, यही समझाया करते थे।
कितना मजा आता था, जब मां खाना अपने हाथों से खिलाया करती थी,
और अपने पल्लू से हवा करके मां हमको सुलाया करती थी।
कितना प्यारा, तब मां की कहानियों का हर बोल हुआ करता था,
बचपन का हर पल, हर लम्हा, कितना अनमोल हुआ करता था।
By Abhay Raj Chand

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