बचपन
Updated: Jul 24, 2025
By Kushagra Singh

चाँद की झलक से भी हरबार याद करता हूँ
साँस की सनक से भी घर-बार याद करता हूँ
ज्वलन नहीं बची मुझमे अंगार याद करता हूँ
बैठकर किनारे पर मझधार याद करता हूँ
रात के अंधेरे मे दिनकर को याद करता हूँ
लेटकर मैं पनघट पर बचपन को याद करता हूँ
होंठ फाँट गए मेरे अब गीत भी न गाऊंगा
सिसकियाँ आती है लेकिन हार भी ना पाऊँगा
बाप हो गए बूढ़े अब जीत भी ना पाऊँगा
तीर जो लगा उनको साँस छिन गई मेरी
दशरथ को याद करता हूँ धड़कन को याद करता हूँ
केश के लहर ने से या डाँट के ठहरने से
चूड़ियों की खन-खन से या नवीन दर्पण से
मोर के ठुमकने से पुष्प के महकने से
प्यार मे बहकने से या चाशनी टपकने से
माता की याद आती है धड़कन मेरी बढ़ाती है
अरे प्रेम की गली मे भी मिठास की बला हो तुम,
चांद की कला सोलह और स्रावी कला हों तुम
सच कहु तो माँ तुझको क्षण क्षण मैं याद करता हूँ
चाँद की झलक से भी हरबार याद करता हूँ
साँस की सनक से भी घर-बार याद करता हूँ
By Kushagra Singh

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