बंजर
- Hashtag Kalakar
- Dec 10, 2025
- 4 min read
By Mansi Dugar
ज़िन्दगी एक मंज़िल है, जिसे जीना सफ़र है और पा लेना जीत।
बचपन से जिस सफ़र को जीते आए थे हम, एक वक़्त बाद बस निभाने लग गए, कई दोस्त बनाए, नए
रिश्ते परखे और अपना सब भुलाते चले गए।
पर मेरे बचपन की एक बात थी, जो मेरे ज़ेहन में ऐसे बसी है जैसे किसी डायरी का वो पन्ना जिसे फाड़ भी
दो तो उसका क़तरा रह ही जाता है।
मुझे नए दोस्त बनाना हमेशा से बेहद पसंद था।
नए लोग, नए रिश्ते और उनमें से कुछ को अपना ख़ास मान लेना।
मैं हर ख़ास को अपने दिल का एक हिस्सा देती जाती थी, नादान थी ना!
पर ऐसे देते-देते मेरे दिल के इतने हिस्से हो गए कि खुद का कुछ बचा ही नहीं।
तो ये अर्ज़ी इस दिल से उस दिल को…
मेरे दिल अगर तुम मुझे मिल जाते
क्या मिलकर सिर्फ़ मेरे रह पाते
क्या रहकर पूरे मेरे हो पाते
क्या मेरे होकर तुम पूरे ख़ुश दिख पाते
जो बँटे हो तुम कई हिस्सों में
क्या हर हिस्से को मेरे नाम कर पाते
जो डरते हो तुम जाने किससे
क्या हर डर को खोकर मुझे मिल पाते
मेरे दिल अगर तुम मुझे मिल जाते
क्या मिलकर सिर्फ़ मेरे रह पाते
ढूँढती हूँ कई लकीरों में तुम्हें
लकीरें खुद की, लकीरें खुदा की
लकीरें खुद से ख़ुदा तक की, लकीरें बंदगी की
पर मिले हैं टूटे हिस्से जिन लकीरों में तुम्हारे
वो लकीरें थीं रिश्तों की, लकीरें मोहब्बत की,
लकीरें अपनेपन की, लकीरें अपनों से परायेपन की…
जाने क्यों बसे हो फिर भी वहीं
जहाँ बसे ना तुम्हारा कोई...
एक पुकार है दिल की कि काश… काश तुम मुझे मिल जाते
मेरे दिल, काश मिलकर सिर्फ़ मेरे रह पाते।
जब भी ज़िन्दगी से थक जाओ ना, बस दो पल खुद के साथ बैठ जाना।
सब ठीक भले ही ना हो, सही ज़रूर होने लगता है।
इंसान जीने के इस सफ़र में ज़िन्दगी तब जीत लेता है जब वो खुद को समझने लगता है।
खुद की पसंद–नापसंद, खुद की खूबियों और खामियों से वाक़िफ़ होने लगता है।
जब हिचकिचाहट से रुकते क़दम, बे-तहाशा थिरकने लगते हैं,
उम्मीदों की सिलवटों में ख़्वाब सरकने लगते हैं,
जब माथे की लकीर पलकों के आशियाने में ढकने लगती है,
कई बातें होती हैं जो हम खुद से कहने लगते हैं|
कला उन बातों से जन्म लेता वो बच्चा है जो धीरे–धीरे हम में पनपने लगता है।
एक बच्चा जो अंजान है दुनिया के रिवायतों से, सामाजिक क़ायदों से,
साँसों से जुड़े दर्द और टूटती–बिखरती उम्मीदों से।
जब वो नादान से हाथ, मासूम सा मन, और वो आँखें,
वो आँखें जिनमें चाह है हर किसी को अपना बनाने की…
जब अपनी कला से मिलते हैं तो वो सफ़र बहुत ख़ूबसूरत लगता है।
इन हाथों की लकीरों में मेरी कला की नुमाइश लिए
मैं चल दी दो हाथ, दो पैर और दिल में एक ख़्वाहिश लिए।
किसी दिन होंगी मंज़िलें अदा गिरबाँ में मेरे,
मैं आज़माती रही खुद को बूंद–बूंद में सागर की गुँजाइश लिए।
मेरे चेहरे तलक पाँव के चर्चे बहुत हैं,
ज़माने को ज़माने ने ज़माने में परखे बहुत हैं।
मैं भी किस खेत की मूली हूँ?
अर्ज़ियाँ मैं देती रही इबादत की मेरी।
पर ऐ ख़ुदा,
तुझ तक आने के यहाँ पर्चे बहुत हैं।
कहीं धर्म के पर्चे, कहीं जाति के पर्चे,
समाज के कहीं, कहीं शोहरत के पर्चे।
मुझे मालूम न था दस्तूर तेरी बनाई दुनिया का,
इस दुनिया में साँसों के ख़र्चे बहुत हैं।
तु मालिक है सबका मगर (×2)
यहाँ मालिक है कोई, किसी के मालिक बहुत हैं।
ये धरती, ये अंबर, ये आग, ये पानी, ये पेड़ (×2)
हम जीवों पे हक़ सब तो तेरा है,
तेरा है मगर, तेरी मिट्टी में मेरे “मैं” के ग़ुरूर का डेरा है।
तेरे आँसुओं की बारिश, तेरी हँसी का धूप,
इंसानियत की रोशनी में इंसानों का अँधेरा है।
मैं फिर भी जलती रही,
मैं फिर भी जलती रही मुझ जैसों की आस में।
देखना था, (×2)
आख़िर लालच के घर में कितना सवेरा है।
फ़रेबी नीयत ने मजबूरी में मज़बूरों को ठग लिया,
मेरा क्या है यहाँ, मैंने क्या है खो दिया।
कमा लूँगी वो जो मैंने खोया था कभी,
अपने दुख में मुझे अफ़सोस उनकी सीरत का हो गया।
ज़रा सा उनमें दिल था, अब और ग़रीब वो हो गया।
“Art derives from pain”
जब वही बच्चा बड़ा होने लगता है...
वो इस दुनिया में बसे फ़रेब, झूठ, लालच, दर्द को देखकर कहीं खुद में खोने लगता है।
तुम्हारी कला तुम्हारे अंदर के बच्चे को तुम में ज़िंदा रखती है।
आख़िर ज़िन्दगी के मझधार में तैर लेना आसान नहीं,
जहाँ बीता हुआ वक़्त और बहता हुआ बचपन लौटकर आता नहीं।
फिर लौटकर आता है तो बस वो अमावस का चाँद,
जिसके पनाहों में हम चादर ओढ़ सो जाते हैं।
पर वो चादर भी अब पहले जैसी मुलायम नहीं।
उनमें अब सिलवटें हैं बिखरी हुई, जिन्होंने खुद से समझौता कर लिया है।अपनी उँगलियों से सुलझाऊँ तो चुभन होती है।
जिन हाथों की लकीरों में मेरी कला ने जन्म लिया था,
अब उनको छू लूँ तो दर्द होता है,
जैसे जो क़िस्मत लेकर आए थे अब सारी आज़मा ली गई है,
और हर आज़माइश ने अपने होने का सबूत दे दिया है।
ये ज़ख़्मी हाथ, इन चरबों में बसी मेरी कला,
इनसे गुज़रता मेरा दिन पाक है साफ़ आईने की तरह।
जब देखा मैंने खुद को उस आईने में कभी,
देखा सच कहीं है और कहीं झूठ भी।
इस सच और झूठ के बीच का फ़ासला कौन तय करे?
इन फ़ासलों के रास्तों पर होंगे थोड़े क़िस्मत के रेत,
उस पर कोशिश है एक पौधे के उगने की।
पत्ता मेरी ज़ेहनत का, फूल मेरी सीरत की,
इनकी डालियों से लिपटी मेरी ज़मीर, जिस जड़ से जुड़ी है
वो ज़मीन बंजर है कि नहीं, ये कौन तय करे?
वो ज़मीन बंजर है कि नहीं, ये कौन तय करे?
By Mansi Dugar

Its a meaningful poem