पिता
By Vijeta
चलते हो दीवार पकड़कर
हर जगह निशान छोड़ जाते हो
पिताजी तुम घर की पूरी खूबसूरती बिगाड़ देते हो
कुछ दिन सही था अब तो रोज़ का हो गया
आपका बुढ़ापा अब सर दर्द है बन गया
क्यों लेना है सहारा इन दीवारों का
अपने हाथों को बनाओ सहारा इन लड़खते पैरो का
आँखो में नमी और चेहरे पर ग़म था
मन में उठा पीड़ा का सैलाब पर मुंह बंद था
छोड़ दिया सहारा अब दीवारों का
लड़खड़ाये जब कदम ख्याल आता तीक्ष्ण तानो का
एक दिन कदमों ने साथ छोड़ दिया
अस्पताल से उनका नाता जोड़ दिया
वहाँ गिनते रहे वो एक एक दिन
खाना तो मिल रहा था प्रतिदिन
पर हाथो में ना था किसी का हाथ
साँसो ने भी छोड़ दिया अब उनका साथ
सोचा उसने दीवारों पर अब रंग लगाते है
इन गंदे दागो को भी मिटाते है
वही पोता आया दौड़ता-
नहीं रंगनी है ये दीवार ;इस घर का प्यारा हिस्सा है
जिन हाथो से दादाजी मुझे उठाते थे
उन यादों का वो किस्सा है
जो उन्हें दाग थे लगते , आज वो निशान है बन गए
एक पोते के लिए दादाजी की पहचान वो बन गए
आज शर्म से आँखे शायद झुक गई होंगी
बच्चे की ये बात दिल को कहीं छुई तो होगी
शायद ऐसा सोचा होता तो बात ही कुछ और होती
उसके पिताजी के चेहरे पर खुशी और ज़िन्दगी थोड़ी ओर जी ली होती
ये कहानी जीवन पर एक निशानी छोड़ गई
ख़ूबसूरती दीवारों में है या अपनों में?ये प्रश्न जोड़ गई
जब छोटे होते थे तब का हाल क्या भूल गए ?
किताबे छोड़, घर की हर दीवार पर अपनी कला दिखाते थे
चॉकलेट खा कर जब पिता के कंधे पर सर रख कर सो जाते थे
अंदाज़ा भी नहीं है कितने दाग वहाँ लग जाते थे
उस पिता को पर दाग ढेर सारी ख़ुशियाँ दे जाते थे
डगमगाते थे पैर जब बचपन में
वो पिता ही थे जो हाथ अपना बढ़ाते थे
उन पलो को जीना आता था उन्हें
अपनापन क्या है पता था उन्हें
वही बुढ़ापे में बोझ लगने लगते
नहीं सहा जाता तो किसी वृद्धाश्रम में है छोड़ देते
काश कुछ ऐसा हो जाए
जब माता पिता का बुढ़ापा सहा ना जाए
सबको अपना बचपन याद आ जाए
शायद कुछ बदल हो जाए
बुढ़ापा एक स्वर्णिम पल बन जाए
By Vijeta

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