पिता
By PRATEEK SAINI
तज़ुर्बे के गुच्छों से लिपटे पेड़ जैसे अटल खड़े हैं
जिंदगी की भागम दौड़ मे अब तक उलझे पड़े हैं
किरदारों की तरह बदलती किस्मत के आदी हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
किस्सों के शब्दों से सजी किताब हो गए
हर जज़्बात की खुली आवाज़ हो गए
घर के मज़बूत दीवारों मे दबे अल्फ़ाज़ हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
कुछ चाहने से पहले घर का हिसाब जोड़ लेते हैं
चोट कितनी भी गहरी हो मन मरोड़ लेते हैं
हर बीमारी मौसम से जोड़ने के माहीर हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
बचत की कहानी के मुख्य किरदार हो गए
सिक्के जोड़ते जोड़ते खुद बेहिसाब हो गए
हर खेल की एक हारी हुई बाज़ी हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
कुछ नया अपनाने मे आनाकानी करते हैं
जवाब मे उम्र का बहाना हर बार रखते हैं
दफ्तर ना जाकर भी घर के कामकाजी हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
भूले नहीं वो दौर आज भी कई दफा दोहराते हैं
य़ादों मे अक्सर काफी दूर निकल जाते हैं
किसी सरकारी दफ्तर जैसे कागजी हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
हर पल हिम्मत की मिसाल देते जाते हैं
खुद की बातों से आज भी सबको हंसाते हैं
मेरी जिंदगी की पतवार के माजी हो गए
पापा देखते देखते ही जाने कब पिताजी हो गए
By PRATEEK SAINI

Comments